ट्रम्प-नेतन्याहू को ईरान ने कैसे सबक सिखाया

Published
Wed, 04/01/2026 - 15:50
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अमेरिकी-इजरायली शासकों द्वारा 28 फरवरी को जब ईरान पर हमले बोलना शुरू किया गया तो हमलावरों के साथ-साथ दुनिया में किसी को भी अंदाजा नहीं था कि यह जंग एक माह से अधिक समय बीतने पर भी जारी रहेगी। हमलावर ट्रम्प-नेतन्याहू मानते थे कि शीर्ष नेताओं की हत्या के बाद ईरानी जनता के सहयोग से एक-दो हफ्तों में सत्ता परिवर्तन करा देंगे। पर ईरान की लम्बी तैयारियों व रूस-चीन की मदद के दम पर युद्ध के एक माह बाद भी ईरान न केवल युद्ध में टिका हुआ है बल्कि हमलावरों को ‘जैसे को तैसा’ की भाषा में जवाब दे रहा है। 
    
आखिर ऐसा कैसे संभव हुआ कि दुनिया में सर्वोत्तम सैन्य क्षमता-हथियार रखने वाले अमेरिकी-इजरायली हमलावरों के आगे अपेक्षाकृत कमजोर हथियार वाला ईरान इतने वक्त तक टिक गया। दरअसल ईरानी शासकों ने सचेत तरीके से अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा बीते 2-3 दशकों में बोले गये हमलों के पैटर्न का अध्ययन किया और उसकी काट के बतौर अपनी रणनीति विकसित की। 
    
इस रणनीति को उन्होंने ‘विकेन्द्रीकृत मोजेक रक्षा’ का नाम दिया। इसमें इस मूल धारणा पर काम किया गया कि अमेरिका-इजरायल से युद्ध में ईरान वरिष्ठ कमाण्डरों, प्रमुख सुविधाओं, संचार नेटवर्क व केन्द्रीकृत नियंत्रण के खोने पर भी जंग लड़ता रहे। इस तरह ईरानी सेना ने दीर्घकालिक युद्ध की रणनीति तैयार की। इसके तहत इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर को एक केन्द्रीय कमान में शक्ति केन्द्रित करने के बजाय क्षेत्रीय व अर्द्ध स्वतंत्र स्तरों पर संगठित किया गया। 
    
इस मॉडल के तहत गार्ड कोर, नियमित सेना, मिसाइल बल, नौसेना संसाधन व स्थानीय कमान को एक वितरित प्रणाली के हिस्से के रूप में गठित किया गया। जिसके चलते एक हिस्से के क्षतिग्रस्त होने पर भी बाकी हिस्से काम करते रहते हैं। वरिष्ठ नेता के मारे जाने पर, संचार बाधित होने पर भी कार्य श्रंखला चलती रहती है व स्थानीय इकाईयां कार्यवाही करने का अधिकार व क्षमता बनाये रखती हैं। 
    
इस प्रणाली के चलते ईरान की सैन्य प्रणाली ध्वस्त करना कठिन हो जाता है व युद्ध किसी एक केन्द्र के बजाय कई केन्द्रों से संचालित होते रह सकता है। इसीलिए ईरानी सेना मारक क्षमता की प्रतियोगिता के बजाय खुद को सहन शक्ति में मजबूत बनाये रखती है। यह रणनीति इराक, अफगानिस्तान युद्ध से सबक लेकर बनायी गयी है जहां केन्द्रीय सत्ता या कमान के पतन के साथ युद्ध में हार हो गयी थी। इसीलिए ईरानी शासकों ने ऐसी रणनीति बनायी कि केन्द्रीय नेता, कमान के ध्वस्त होने पर भी जंग जारी रखी जा सके। इसके लिए उन्होंने किसी हद तक चीन की गुरिल्ला लड़ाई से भी सबक लिया और अपने को इसके लिए सक्षम बनाया कि वे लम्बी लड़ाई खींच सकें। संघर्ष लम्बा खींच दुश्मन की युद्ध की लागत बढ़ायी जाये व अंततः उसे जंग छोड़ने पर विवश कर दिया जाये। 
    
इस रणनीति में विभिन्न सैन्य अंगों को अलग-अलग भूमिकायें दी गयीं। नियमित सेना का काम पहला हमला झेलना, दुश्मन की प्रगति को धीमा करना था। वायु रक्षा इकाईयां का काम छलावरण, छल का इस्तेमाल कर दुश्मन की हवाई श्रेष्ठता को कमजोर करने का प्रयास करना था। गार्ड कोर व बासिज बलों की भूमिका विकेन्द्रीकृत अभियानों, घात लगाकर हमला, स्थानीय प्रतिरोध, दुश्मन की आपूर्ति लाइन को बाधित करना, पहाड़ों व दूरस्थ इलाकों में फैले लचीले अभियानों से युद्ध लम्बा खींचना है। गार्ड व बासिज बलों को सभी 31 प्रांतों में संगठित कर कार्यवाही की व्यापक स्वायत्तता दी गयी है। नौ सेना खाड़ी व होरमुज के इर्दगिर्द जहाजों पर हमला, बारूदी सुरंगें बिछाने, जहाज रोधी मिसाइलों के जरिये मूलतः व्यापारिक मार्ग पर नियंत्रण रखने का काम करती रही है। मिसाइल बल दुश्मन के बुनियादी ढांचे व सैन्य ढांचे को नुकसान पहुंचाने का काम करते हैं। इसके साथ ही अन्य सहयोगियों हूती-हिजबुल्ला, इराक के प्रतिरोध संगठनों के साथ तालमेल की भी तैयारी की गयी थी। 
    
सत्ता के शीर्ष पर भी चतुर्थ स्तरीय संरचना बनायी गयी थी जहां एक नेता के मरने पर उसकी जगह लेने वाले चार उत्तराधिकारी पहले से तय कर दिये गये थे। हर महत्वपूर्ण पद पर चार उत्तराधिकारी तैयार रखे जाते थे। एक नेता के मरने या गायब होने पर दूसरा फिर तीसरा व चौथा उत्तराधिकारी सत्ता संभालने को तैयार किया गया था। 
    
इस तरह की सैन्य, प्रशासनिक संरचना के दम पर ही ईरान अभी तक इस जंग में न केवल टिका हुआ है बल्कि अमेरिका-इजरायल को मुंहतोड़ जवाब दे रहा है। यही संरचना अमेरिका को सीधे सेना उतारने से रोक रही है क्योंकि लम्बा युद्ध खींच कर ईरानी सेना अमेरिकी सैनिकों को बड़े पैमाने पर मार सकती है। 
    
इस सबमें ईरानी जनता का रुख चीजों को निर्णायक ढंग से बदल देता है। अभी तक ईरानी जनता अमेरिकी-इजरायली हमले को ईरान की सम्प्रभुता पर हमले के रूप में देख अपने शासकों के साथ कमोबेश खड़ी रही है। इसने ईरानी शासकों को मजबूती दी है पर युद्ध लम्बा खिंचने पर चूंकि ये शासक भी शोषणकारी हैं, तब जनता अपनी बढ़ती बदहाली व शासकों के दमन से तंग भी आ सकती है। ऐसे में ईरान की मजबूत रणनीति भी भरभरा सकती है। यह एक ऐसी कमजोरी है जिसकी शिकार हर पूंजीवादी सत्ता होती है। पर फिलहाल तो ईरानी शासक व जनता अमेरिका-इजरायल के होश फाख्ता कर रहे हैं। 
 

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