कहानी - नदामत (पश्चाताप)

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वृद्ध माता की उम्र 65 वर्ष के आस-पास है। जीवनसाथी का देहांत हुए एक अरसा बीत चुका है जो जाने से पहले किराए के पांच कमरे छोड़ गए थे। दोनों बेटे बाहर ही रहते हैं और तीज-त्यौहार में घर आते रहते हैं। पति की जोड़ी गई सम्पत्ति की हिफाजत, किरायेदारों पर रौब गालिब करना, किरायेदारिनों पर सास की तरह हुकुम चलाना। वृद्धावस्था में अगर दुख था तो नाती-पोतों, बच्चों के संग साथ का। मकान मालिकों के भीतर बैठी हुई आम समझ होती है मानो किरायेदारों की ये भीड़ इंसानी जात से महरूम कोई अलहदा जमात हो। बूढ़ी मालकिन भी इससे अछूती न थी।
    
सुरेन्द्र बाबू चार साल से यहां किरायेदार हैं। बेटे का जन्म यहीं हुआ जो अब तीन साल का है। मालकिन को माई बोलता है। फैक्टरी से कमरे की दूरी महज 10 मिनट की है। सरल, सहज, सुलझे स्वभाव की वजह से सबको प्रभावित कर ले जाते है जिससे मकान मालकिन भी अछूती नहीं है। मगर बीते कुछ दिनों से परेशान हैं।
    
नाहक परेशान हो रही हो! चंद रोज की बात है। महीना होते ही चले जाएंगे। पत्नी की नाराजगी का कारण मकान मालकिन का हुक्मनामा था, कमरा खाली करने का। पत्नी की नाराजगी का इल्म सुरेन्द्र बाबू जानते हैं।
    
यूं तो बाज दफा ऐसे हुक्मनामों को सुरेन्द्र बाबू ने सूझ-बूझ से हल कर लिया था लेकिन इस बार पत्नी के लिए आत्मसम्मान की बात थी। समझने-बुझाने की कोई भी तरकीब पत्नी के तमतमाए चेहरे के आगे बेअसर है।
    
नन्हें गोलू को सख्त हिदायत है कि माई के पास नहीं जाना है। मासूम दिल हिदायतों की रवायतें नहीं जानते। नाफरमानी उनके खून में, जहन में मिली होती है। मगर नन्हीं उंगलियों के नाजुक पोर दरवाजों की सांकलों से पार नहीं पा पाते।
    
नन्हें गोलू ने जब घुटने-घुटने चलना शुरू किया था तब से ही मकान मालकिन के रसोईघर के सामान से बगावत शुरू कर दी थी। बूढ़ी मालकिन नन्हीं उंगलियों से सामान छुपाती तो कभी बिखरे आटे को समेटती। लाख पहरों के बावजूद खोजी निगाहें हर चीज में अपना मतलब ढूंढ लेतीं। उम्रदराजी के इस इस दौर में लगभग ढाई साल से गोलू जिस सफर में शामिल रहता आया था बीते कुछ दिनों से थम गया है। पिछले चंद रोज से चीजें, सामान अपनी जगह व्यवस्थित लेकिन खामोश और बेजान पड़ी हैं।
    
किराया बूढ़ी मालकिन की सम्पत्ति बढ़ाने का जरिया है। मगर इसी निजी संपत्ति ने उसे गैर इंसानी जज्बातों से भर दिया था। नदामत का एहसास होता भी तो कैसे? उम्र के इस पड़ाव में एक गैर ताल्लुकेदार साधारण मजदूर के पास जाकर शर्मिंदा होना निजी संपत्ति के मुंह पर तमाचा होती। निजी संपत्ति नुमा रकीब की, इस दुश्मन ए जां की शिकस्त आसान नहीं है।
    
दो दिन से माताजी दिखाई नहीं दीं, तबियत तो ठीक है? कुछ चिंता के भाव से सुरेन्द्र बाबू ने जानना चाहा। ‘‘तुम्हें क्या करना है बुढ़िया की तबियत से?’’ दुबारा पूछने की हिमाकत! तौबा करो। चुपचाप सामान बांधने लग जाते हैं।
    
गाड़ी बुला लो! पत्नी ने जुमला ए अमरी के लहजे में बात कही। सामान चढ़ाने का सिलसिला शुरू हो चुका है जिसकी आवाज धीमी है लेकिन पत्नी की स्वर लहरी में मानो जीत की घोषणा हो। जिसके आगे एक बारगी बूढ़ी माता से मिलने की अभिलाषा डरी-सहमी खामोश हो जाती है।
    
बीती रात से बूढ़ी मालकिन बुखार में है। गाड़ीवान सामान और लोगों के साथ रुखसत हो चुका है। शाम ढलते-ढलते बुखार की प्रबलता ने बूढ़ी देह को धर दबोचा। गाड़ी जाने की आवाज ही बूढ़ी देह के कानों में गूंज रही है। बदहवासी के आलम में मुंह से एक ही बुदबुदाहट निकल रही है...गोलुवा...गोलुवा।
    
नए कमरे में सामान रखते हुए सुरेन्द्र बाबू ने फोन उठाया। ‘‘माताजी तेज बुखार में तप रही हैं, दवा भी नहीं ले रहीं। बस गोलू को बुला रही हैं। तुम तुरंत आ जाओ।’’ फोन स्पीकर पर ही था। पत्नी के भीतर ममता और अपनत्व की तेज लहर उठी जिसमें सारे गिले भाप बनकर उड़ गए। ‘‘देख क्या रहे हो! गोलू को लेकर चलो’’। अल्फाजों में इस वक्त भी जुमला -ए-अमरी थी, फर्क था तो सिर्फ इंसानी एहसासातों का।
    
माई तोहके का भयल? तुतलाई जबान ने कान के पर्दों को छुआ। नन्हें पोरों ने जैसे ही गीले कपड़े से माथे को स्पर्श किया मानो दुआओं ने जिंदगी को छू लिया हो। ‘‘गोलु...आ ..तू  आ गाइनी रे?...तू अब कहीरो मत जेईहा हो!’’
    
निजी संपत्ति यकीनन दुश्मन ए जां है, रकीब है, इसकी मौजूदगी ने उम्रदराजी को अहंकार से भरा लेकिन अब वही अहंकार जिंदगी का दुश्मन बन बैठा। इंसानी जज्बातों के हाथों रकीब की हार हुई। बूढ़ी देह अब वात्सल्य से भर उठी, झुर्रीदार आंखों में अब सिर्फ नदामत थी और आंसू।
    
नए कमरे का एडवांस पहले ही दिया जा चुका था। जानते हैं कि एडवांस तो अब वापस न होगा और न ही शिफ्ट ही हो पाएंगे। पत्नी की तरफ देखते हैं, पत्नी स्वीकृति में सर हिलाती है मानो कह रही हो दादी और पोते को अलग करने का पाप मुझसे तो न होगा ! दवाई खा ल अ माई। गोलू कहीं न जाई।’’ गहरे स्नेह भरे शब्द सुरेन्द्र बाबू के थे।
                -पथिक
 

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