पहली बार त्रासदी दूसरी बार प्रहसन

Published
Mon, 06/01/2026 - 15:50
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आज से ठीक पंद्रह साल पहले गर्मियों में तथाकथित अन्ना हजारे आंदोलन शुरू हुआ था जिसने देश के लाखों-लाख युवाओं को उद्वेलित किया था। वो युवा इस उम्मीद से इस आंदोलन से जुड़े थे कि यह आंदोलन ‘व्यवस्था’ बदलेगा। यह देश में चैतरफा फैले भ्रष्टाचार को खत्म करेगा और देश को तरक्की के नए रास्ते पर ले जाएगा।
    
लेकिन इस आंदोलन से क्या हासिल हुआ? यही कि केंद्र में मोदी और भाजपा तथा दिल्ली में केजरीवाल और आम आदमी पार्टी सत्तानशीन हो गए। एक हिंदू फासीवादी और दूसरा अवसरवादी फासीवादी। देश के लाखों लाख युवा ठगे गए और बाद में उन्होंने यह महसूस भी किया। 
    
आज पंद्रह साल बाद युवा पाते हैं कि देश पहले से ज्यादा भ्रष्ट हुआ है। सत्ता का लालच और ज्यादा मजबूत हुआ है। ‘व्यवस्था’ पहले से और ज्यादा निरंकुश हुई है। आम जन की आवाज पहले से ज्यादा अनसुनी हो गई है। युवा क्षुब्ध और आक्रोशित हैं। वे भीतर से उबल रहे हैं। 
    
युवा आक्रोश और क्षोभ की इस अवस्था में कोई भी चिंगारी दावानल में आग लगा सकती है। और पिछले दिनों यही हुआ। देश के युवाओं को काॅकरोच बताए जाने पर जो आक्रोश फूटा वह देखते ही देखते चंद दिनों में इंटरनेट की दुनिया में दावानल बन गया। ‘काॅकरोच जनता पार्टी’, ‘मैं भी काॅकरोच’, काॅकरोच गाने, काॅकरोच मीम इत्यादि वहां छा गए। इंटरनेट पर काॅकरोच इंकलाब हो गया।
    
लेकिन इंटरनेट पर इस इंकलाब को उस सरकार द्वारा निरस्त या भ्रष्ट करने में जरा भी समय नहीं लगा जो वैसे भी इंटरनेट को नियंत्रित करने के सारे इंतजाम करके बैठी हुई है। संघी सरकार इंटरनेट द्वारा प्रचार की ताकत को अच्छे से पहचानती है क्योंकि सत्ता में आने और फिर सत्ता में बने रहने के लिए उसने इसका भरपूर इस्तेमाल किया है- और किसी से भी पहले तथा ज्यादा। आज भी यह ‘डिजिटल स्पेस’  में सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है। 
    
इस इंटरनेटी इंकलाब या काॅकरोची परिघटना का जमीनी स्तर पर कोई असर पड़े या ना पड़े पर उसने एक चीज को रेखांकित किया। वह है देश में युवा आबादी में व्याप्त क्षोभ और आक्रोश। वह ‘व्यवस्था’ से बुरी तरह खफा है। वह इसमें परिवर्तन चाहता है। पर उसे कोई राह नहीं दिखती। दूसरी ओर यही ‘व्यवस्था’ के कर्ता-धर्ता उसे कहीं और भटकाए रखने के लिए हर इंतजाम करते हैं। जब देश का प्रधानमंत्री ‘रील’ बनाता हो और इसके लिए प्रेरित करता हो तो शक की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती।
    
पंद्रह साल पहले ‘अन्ना आंदोलन’ के समय देश के ढेर सारे उदारवादी और वाम उदारवादी उसके मुरीद हो गए थे। वे कांग्रेस के कुशासन से नाराज थे और किसी भी विकल्प को गले लगाने को तैयार थे, भले ही वह संघ समर्थित ‘अन्ना आंदोलन’ ही क्यों न हो। बाद में इनमें से बहुतों ने पश्चाताप किया और कुछ ने माफी भी मांगी।
    
कहते हैं कि दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो लाइलाज होते हैं। इस तरह के लोगों ने इस ‘काॅकरोच इंकलाब’ में नई उम्मीद देखी। या ज्यादा सही कहें तो वर्तमान शासन से त्रस्त होकर एक तिनके को ही पकड़ लिया। विपक्षी पार्टियां कुछ नहीं कर पा रही हैं तो ‘काॅकरोच इंकलाब’ ही सही। 
    
ऐसे लोगों के लिए कहा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी एक त्रासदी थी तो काॅकरोच जनता पार्टी एक प्रहसन। इन भले मानुषों ने एक प्रहसन को ही अगाध गंभीरता से ले लिया है। इन लाइलाज लोगों को अपने हाल पर छोड़ा जा सकता है। पर देश के युवाओं को इंटरनेटी इंकलाब से आगे बढ़कर वास्तविक इंकलाब के लिए सड़कों पर उतरना होगा।
 

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