मोदी सरकार के बारह साल: हाल बेहाल

Published
Tue, 06/16/2026 - 06:50
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संघ परिवार और मुख्य धारा का मीडिया प्रधान सेवक के 12 सालों के कार्यकाल पर मंत्रमुग्ध है। ‘महामानव’ का इस पर आत्ममुग्ध होना स्वाभाविक है। इस आत्ममुग्धता को देखकर शेष हिंदू फासीवादी वाह-वाह की मुद्रा में हैं। आखिर ‘महामानव’ अपनी इस महान और खास उपलब्धि पर आत्ममुग्ध क्यों ना हो! उनकी भक्तमंडली के हिसाब से उन्होंने नेहरू और इंदिरा गांधी को पछाड़ दिया है और भारत के लम्बे समय तक और लगातार प्रधानमंत्री बने रहने का रिकार्ड बना दिया है। इसके अलावा 12 महान ऐतिहासिक उपलब्धियां इन्होंने हासिल कर ली हैं। 
    
तथ्यों और तर्क के मनमाने चयन में और फिर इसके इस्तेमाल में हिंदू फासीवादी अव्वल हैं। ‘महामानव’ का भी यह एक विशेष गुण है जैसा कि हर फासीवादी व्यक्ति के लिए इस एक विशेष योग्यता का होना जरूरी होता है। वैसे तथ्यों को दूसरे ढंग से देखा जाय तो ‘महामानव’ अभी भी इन दोनों (नेहरू, इंदिरा) से काफी पीछे हैं। और यह भी तथ्य है कि दोनों अंतिम समय तक प्रधामनंत्री बने रहे थे। नेहरू अमेरिकी साम्राज्यवादियों की शह पर चीन युद्ध में हार से छवि को हुए नुकसान और इससे उपजी हताशा के शिकार हुए और अंततः प्राकृतिक मौत मरे। इंदिरा गांधी खालिस्तानियों के रूप भिंडरावाले को आगे बढ़ाने और इसे नियंत्रित करने के चलते मारी गईं।
    
‘महामानव’ ने खुद को चूंकि अजैविक घोषित किया हुआ है। कभी-कभी उन्हें खुद में ईश्वरीय शक्ति होने का अहसास होता है जैसा कि हिटलर को भी बार-बार होता था। इसलिए स्वयं में वे, इस तरह के व अन्य संकटों से मुक्त रहने का ‘भ्रम’ दिखावे के लिए करते रह सकते हैं। मगर प्रधान सेवक मोदी को गुजरात में पाल-पोस कर दिल्ली के तख्त पर बिठाकर ‘महामानव’ बनाने वाले जानते है कि उनका ‘महामानव’ अब संकटों से घिरा हुआ है और संकट है कि खत्म होने का नाम नहीं लेता। बल्कि यह तो बढ़ता जाता है। इस बढ़ते संकट के साथ ‘महामानव’ की छवि को बनाए रखने के लिए इनकी मीडिया और हिंदू फासीवादियों का महा अभियान निरंतर जारी है। इन 12 सालों में कथित उपलब्धियों की गाथा बताने का खेल संकटों के बढ़ने के साथ जोर-शोर से चल रहा है।
    
वास्तव में ‘महामानव’ के ये 12 साल इन एकाधिकारी पूंजीवादी घरानों और हिंदू फासीवादियों के लिए अमृत काल हैं। दोनों की ताकत बढ़ी है दोनों की हैसियत बढ़ी है। हिंदू फासीवादी ‘चंदा दो धंधा लो’ के जरिए भी मालामाल हुए हैं। इनकी दौलत और सम्पत्ति बढ़ रही है। एकाधिकारी पूंजीवादी घरानों को तो अपने इस सेवक से मुंहमांगी चीजें हासिल करनी ही थीं। इनमें अडाणी-अंबानी शीर्ष पर हैं। इन्हीं के हिसाब से नीतिगत योजनाएं बनाई और लागू की जा रही हैं। इसके बदले वे इलेक्टोरल बांड और अन्य तरीकों से ‘महामानव’ की पार्टी को करोड़ों का चंदा दे रहे हैं। हिंदू फासीवादी इन 12 सालों में अपने राजनीतिक प्रभाव, वर्चस्व का दायरा बढ़ाते गए हैं। सत्ता के हर अंग में घुसपैठ करते हुए इसे मजबूत करते गए हैं।
    
‘महामानव’ के ये 12 साल हिंदू  फासीवादियों के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि हैं। इसका स्वाभाविक मतलब है जनता के हर हिस्से की हालत हर दृष्टि से ज्यादा खराब होते जाना। उपलब्धि के नाम पर बताने को इनके पास बहुत कुछ है। ये शान से खुले या फिर छुपे रूप में इसका जिक्र भी करते रहे हैं। इनकी यह ऐतिहासिक उपलब्धि है सांप्रदायिक उन्माद के जरिए निरंतर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण। मुसलमानों को काल्पनिक दुश्मन के रूप में स्थापित करने में इन्होंने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। इसी से जुड़ी उपलब्धि है- तीन तलाक, अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करना, राम मंदिर, नागरिकता संशोधन कानून, यू सी सी, वक्फ संशोधन बिल इत्यादि। इन मुद्दों के निशाने पर मुसलमान ही हैं और इसके जरिए बहुसंख्यक हिंदू समुदाय को अपने पाले में करने का काम किया गया।
    
इन मुद्दों के जरिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके जो उपलब्धि हासिल की गई, वह है समूची राजनीति को दक्षिणपंथ की दिशा में मोड़ देना। सेक्युलर यानी धर्मनिरपेक्षता जो पहले कभी थी भी नहीं, जो था वह सर्व धर्म समभाव ही था मगर अब यह भी लगभग खत्म है। मगर हिंदू फासीवादियों की सरकार ने बिना औपचारिक घोषणा के ही हिंदू राष्ट्र की तरह काफी हद तक आचरण शुरू कर दिया है। यह निश्चित तौर पर ‘महामानव’ और हिंदू फासीवादियों की उपलब्धि है।
    
इसी के साथ ही इसी से जुड़ी सबसे बड़ी उपलब्धि है- देश के मौजूदा जनतंत्र को खोखला करते हुए फासीवादी तानाशाही स्थापित कर सकने के करीब पहुंचा देना। जनतंत्र में जन के लिए तो पहले से ही सीमित गुंजाइश थी। मगर पिछले 12 सालों में चरण दर चरण इसे कमजोर करते हुए खत्म करने के करीब पहुंचा दिया गया। और अब तो विशेष गहन पुनर्रीक्षण के जरिए ‘महामानव’ और उनकी टीम ही तय करेगी कि कौन उनका नागरिक व वोटर होगा और कौन नहीं। यह भी इनकी विशेष उपलब्धि ही है। 
    
इन बीते 12 साल में तीखे सांप्रदायिक उन्माद से इन्होंने आम जन को लंपट उन्मादी भीड़ में बदलने में भी उपलब्धि हासिल की है। इसका नतीजा है अलग-अलग नाम से बढ़ती कथित भीड़ हत्याएं। जिनमें अधिकतर लंपट फासीवादी गिरोह द्वारा की जाती हैं। इससे अलग इस सांप्रदायिक उन्माद के जरिए ही इन्होंने गुजरात के बाद मणिपुर माॅडल विकसित किया है। जहां घाटी बनाम मैदान या कूकी बनाम मैतेई या फिर ईसाई बनाम हिंदू के रूप में ध्रुवीकरण के जरिए माॅडल खड़ा किया गया है। भयानक हिंसा, आगजनी, हत्याएं और विस्थापन की बीते तीन साल की स्थिति अभी बनी हुई है या बनाए रखी गई है। 

निश्चित तौर पर ‘महामानव’ के ये बारह साल बड़े पूंजीपतियों और हिंदू फासीवादियों के लिए बेमिसाल रहे हैं। इनकी तरह-तरह की उपलब्धियों में मजदूर वर्ग समेत जनता के हर हिस्से के जीवन को नारकीय बनाना भी है। अब देखने की बात है कि जनता कब इन उपलब्धियों को खारिज करके इसमें पलीता लगाने का काम करती है। वैसे यह काम होना शुरू भी हो चुका है। 

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