हिंदू फासीवादियों के मनमुताबिक कोर्ट का फैसला

Published
Mon, 06/01/2026 - 15:50

अंततः वही हुआ जिसकी उम्मीद थी। विशेष गहन पुनरीक्षण संवैधानिक है या नहीं, इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका पिछले साल लगी थी। यह मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त और जोयमाला बागची की बेंच के पास थी। याचिका ए डी आर ने  लगाई थी। मई माह के अंत में सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच ने एस आई आर के संवैधानिक होने के पक्ष में फैसला दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से कटे हैं या जो संदिग्ध नागरिकता की सूची में हैं, चुनाव आयोग को गृह मंत्रालय को उनकी सूची सौंपनी होगी। साफ है कि यहां से फिर नागरिकता को साबित करने की हिंदू फासीवादी मुहिम शुरू हो जाएगी। यानी जो एन आर सी पहले सीधे 2020 में होने की बात की जा रही थी वह अब अंततः विशेष गहन पुनरीक्षण की आड़ में मतदाता सूची से बाहर किए गए या संदिग्ध ठहराए गए मतदाताओं की नागरिकता की जांच होगी। 
    
कोर्ट ने ये भी कहा कि चुनाव आयोग को सीमित स्तर पर नागरिकता की जांच का अधिकार है हालांकि इसका निर्णय अंतिम नहीं होगा। अंतिम तौर पर नागरिकता की जांच और फैसले का अधिकार गृह मंत्रालय का है।
    
सुप्रीम कोर्ट में याचिका कर्ताओं ने तर्क दिए कि यह एस आई आर नागरिकता परीक्षण ही है। चुनाव आयोग का यह एस आई आर असंवैधानिक है क्योंकि अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 चुनाव आयोग को यह अधिकार नहीं देता। मगर सुप्रीम कोर्ट ने तर्क दिया कि यह नागरिकता परीक्षण नहीं है और एस आई आर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव से जुड़ा हुआ है। शुद्ध मतदाता सूची बनाने का अधिकार चुनाव आयोग को है इसके लिए पुनरीक्षण का अधिकार चुनाव आयोग के पास संविधान में है। यह सीमित स्तर पर नागरिकता जांच कर सकता है।
    
हकीकत यही है चुनाव आयोग का यह विशेष गहन पुनरीक्षण हिंदू फासीवादियों का एक हथकंडा है, यह कहीं से भी पहले की ही तरह का मतदाता शुद्धिकरण अभियान नहीं है। चुनाव आयोग ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाने की जगह खुलेआम हिंदू फासीवादी सरकार के पक्ष में सभी भ्रष्ट तौर-तरीके इस्तेमाल होने दिये। चुनाव की तारीख तय करने से लेकर, मोदी के प्रचार और फिर चुनाव से ठीक पहले पैसे खाते में डलवाने तक हर जगह चुनाव आयोग ने हिंदू फासीवादियों के पक्ष में काम किया। 
    
मतदाता शुद्धिकरण का जहां तक सवाल है इसमें अब तक 6-7 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। इन्हें मृत, स्थानांतरित बताया गया है। सवाल यह है कि जो स्थानांतरित हैं वह आगे कहां गए। यदि देश के एक हिस्से से उनका स्थानांतरण हुआ है तब निश्चित तौर पर दूसरी जगह मतदाताओं की संख्या बढ़ जानी चाहिए। क्योंकि विदेश को इस कदर पलायन नहीं हुआ है। मगर इस पर सवालिया निशान नहीं लगाए गए। उपरोक्त 7 करोड़ में से 5 करोड़ मतदाता 2024-25 में मतदाता सूची में थे। 
    
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने खुलकर हिंदू फासीवादियों के एनआरसी अभियान को आगे बढ़ाने की राह खोल दी है। और जैसे-जैसे देश में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असंतोष गहरा रहा है वैसे-वैसे नागरिकता साबित करने का बोझ जनता पर डालकर उसे इस जाल में फंसाने की ओर कदम बढ़ाए जा रहे हैं। आने वाले समय में शेष 16 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर होना तय है।
    
अब साफ है कि एक ओर चुनाव आयोग मतदाता सूची के शुद्धिकरण की आड़ में बड़े पैमाने पर नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर करते जाएगा और नोटिस आदि के जरिए नागरिकता जांच के कदम उठायेगा। दूसरी तरफ हिंदू फासीवादी मतदाता सूची से बाहर हो गए और संदिग्ध ठहराए गए मतदाताओं के कंधों पर नागरिकता साबित करने का बोझ डालकर समाज को बड़े साम्प्रदायिक विभाजन की ओर धकेलेंगे। क्योंकि ये अवैध घुसपैठियों या मुसलमानों का तर्क देकर इसके जरिए बड़े स्तर पर 2020 की ही तरह सी ए ए-एन आर सी विरोधी आंदोलन के दौर की ही तरह माहौल बनाने की ओर बढ़ेंगे। इसके साथ ही मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए लोगों के संबंध में योजना और राशन आदि की योजनाओं को बंद करके इस पैसे को पूंजीपतियों को लुटाया जायेगा।
    
कोर्ट ने फिर तर्क और तथ्यों को सर के बल खड़ा कर दिया है। ऐसा जानबूझकर किया गया। वरना सुप्रीम कोर्ट सवाल कर सकता था कि क्यों जिस पुराने तरीके से पिछले 70 सालों से भांति-भांति के तरीके से पुनरीक्षण होता था और मतदाता सूची तैयार होती थी उसी तरह इस बार क्यों नहीं की जा रही? यह भी सवाल पूछ सकता था कि ई आर ओ को किसी भी मतदाता को सूची में डालने यानी उसकी नागरिकता पर फैसला करने का एकतरफा अधिकार क्यों दे दिया गया? क्यों पश्चिम बंगाल में एस आई आर की प्रक्रिया या नियम से भी हटकर ई आर ओ को हटाकर बाहर से माइक्रो आब्जर्वर तैनात करके मतदाता सूची को तैयार करने में लगा दिया गया? किस आधार पर चुनाव आयोग ने 2003 की मतदाता सूची को शुद्ध और सही मान लिया? ऐसे कई सवाल थे। मगर जब कोर्ट हिंदू फासीवाद के आगे समर्पित हो तो सवाल नहीं होते बल्कि हर गलत प्रक्रिया और हर साजिश पर पर्दा डाला जाता है। गलत को सही साबित करके गलत के पक्ष में फैसला दे दिया जाता है।
    
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मतदाता सूची से नाम हटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं है। गर यही बात सही है तो नागरिक को मतदाता सूची से हटाकर मतदान के संवैधानिक अधिकार से वंचित कैसे किया जा सकता है। लाखों लाख मतदाताओं के नाम को मतदाता सूची से हटा दिया जाता है और चुनाव करवा लिए जाते हैं। फिर कहा जाता है जो मतदाता वोटर लिस्ट से बाहर हो गए उनकी नागरिकता पर सवाल नहीं। फिर तर्क आगे बढ़ाकर कह दिया जाता है कि कोई बात नहीं वे अगले चुनाव में वोट दे सकते हैं। 
    
यह और कुछ नहीं पूंजीवादी लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा पर ही हमला है। और साफ दिखलाता है कि अब संसदीय लोकतंत्र खुलेआम हिंदू फासीवादी तंत्र में बदल रहा है। पर्दे के पीछे से इसके असली सूत्रधार देश की बड़ी और विशाल पूंजी के मालिक हैं। एस आई आर के जरिए एक खास संख्या में मतदाताओं की काट-छांट करके, अपने मनमुताबिक मतदाताओं का चुनाव करके संघ-भाजपा खोखले चुनावों के आयोजन से लंबे समय तक सत्ता पर बने रहने की योजना बना चुके हैं। 
    
मगर हिंदू फासीवादियों का यह कारनामा भी जल्द ही इनके खिलाफ जाएगा। इनकी बर्बरता, दमन, घोर जनविरोधी नीतियां और कार्यवाहियां इन्हें बेनकाब कर रही हैं। यह जल्द ही विस्फोट के रूप में सामने आएगा। तब ज्यादा खुलकर नग्न तानाशाही का इनका असली रूप भी सामने आ जाएगा। यही इनके खात्मे की शुरुवात भी होगी।

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