अर्थव्यवस्था

पिकेटी का ग्लोबल जस्टिस प्रोजेक्ट: साम्राज्यवाद की पैरोकारी

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

आपदा में अवसर का संघी माॅडल

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हालिया विधानसभा चुनावों में देश की बेहतरीन हालत का ढिंढोरा पीटने के कुछ दिन बाद देश के संघी प्रधानमंत्री ने विदेश की धरती से इसका ठीक उल्टा राग अलापा। उन्होंने कहा कि यह

‘अमृत काल’ में अर्थव्यवस्था की डूबती नैय्या

अंततः प्रधानमंत्री मोदी को स्वीकारना पड़ा कि भारतीय अर्थव्यवस्था संकट में है। उन्हें मानना पड़ा कि इस संकट के चलते करोड़ों लोग गरीबी रेखा के नीचे जाने की कगार पर हैं। बस जिस

कम खाओ-गम खाओ

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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता को मितव्ययिता का पाठ पढ़ा दिया है। खाने में तेल का इस्तेमाल कम करो, आवागमन में पेट्रोलियम तेल का इ

पेट्रो डालर व्यवस्था पर बढ़ रहे खतरे

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1971 में संयुक्त राज्य अमेरिका दिवालिया होने की कगार पर था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने वैश्विक वित्त व्यवस्था को एक वादे के आधार पर खड़ा किया था। प्रत्येक डॉलर सो

गिरता रुपया, गिरता ‘राष्ट्रीय गौरव’

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इन दिनों रुपया गिरता और बस गिरता ही जा रहा है। मार्च के तीसरे हफ्ते में रुपया डालर के मुकाबले 94 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया है। मगर अब ‘राष्ट्रीय गौरव’ डालर रुपए

लम्बा खिंचता युद्ध : बढ़ती दुश्वारियां

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अमेरिकी-इजरायल हमलावरों द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध को एक माह से अधिक हो चुका है। ट्रम्प-नेतन्याहू का चंद दिनों में ईरान में सत्ता परिवर्तन का ख्वाब धूल धूसरित हो चुका

युद्ध-अर्थव्यवस्था और जनता

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पहले से ही 4 वर्ष से रूस-यूक्रेन युद्ध की मार झेल रही विश्व अर्थव्यवस्था अब ईरान युद्ध के साथ नये खतरों का सामना कर रही है। ईरान युद्ध का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव अ

रसोई गैस-तेल-खाद की मारामारी : बंशी बजाता नीरो

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ईरान युद्ध का असर भारत की सड़़कों पर नजर आने लगा है। रसोई गैस भरवाने की लम्बी कतारें इस बात की गवाह हैं कि अमेरिकी-इजरायल मिसाइलें भले ही ईरान को तबाह कर रही हों पर उसका अ

आलेख

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।