आखिरी बातचीत -लू शुन

Published
Fri, 10/16/2026 - 07:50
/aakhiri-batcheet-lu-xun

लू शुन की बरसी (19 अक्टूबर) के अवसर पर उनकी एक लघु कथा
    
पिताजी बहुत मुश्किल से ही सांस ले पा रहे थे। यहां तक कि उनकी सीने की धड़कन भी मुझे सुनाई नहीं दे रही थी। मगर अब शायद ही कोई उनकी कुछ मदद कर सकता था। मैं बार-बार यही सोच रहा था कि अच्छा हो, यदि वे इसी तरह शान्तिपूर्वक परलोक चले जाएं। पर तभी अचानक मुझे लगा कि मुझे इस तरह की बातें नहीं सोचनी चाहिएं। मुझे ऐसा लगने लगा मानो मैंने इस तरह की बात सोचकर कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो। लेकिन तब न जाने क्यों मुझे यह भी लगता था कि अपने मरते हुए पिता की शान्त-मृत्यु की कामना करना कोई गलत बात भी नहीं है। आज भी मुझे यह बात ठीक लगती है।
    
उस दिन सुबह-सुबह हमारे घर के अहाते में ही रहने वाली श्रीमती येन हमारे पास आईं और पिता की हालत देखकर उन्होंने पूछा कि अब हम किस चीज का इन्तजार कर रहे हैं। अब समय बरबाद करने से क्या फायदा। श्रीमती येन के कहने पर हमने पिता के कपड़े बदले। उसके बाद नोट और कायांग-सूत्र जलाकर उनकी आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना की। फिर उस राख को एक कागज में लपेटकर वह पुड़िया उनके हाथ में पकड़ा दी।
    
-उनसे कुछ बात करो! श्रीमती येन ने कहा- तुम्हारे बाबूजी का आखिरी समय आ पहुंचा है। जल्दी से उनसे बात कर लो।
    
-बाबूजी! बाबूजी! मैंने उन्हें पुकारा।
    
-जोर से बोलो। उन्हें तुम्हारी आवाज सुनाई नहीं पड़ रही। अरे भाई, जल्दी करो, तुम जोर से नहीं बोल सकते क्या?
    
-बाबूजी! बाबूजी! मैने फिर से कहा। अब की बार थोड़ा जोर लगाकर।
    
उनके चेहरे पर पहले जो थोड़ी-बहुत शान्ति दिखाई दे रही थी, वह गायब हो गई थी। अब फिर से उनके चेहरे पर पीड़ा छलकने लगे थी। बेचैनी के साथ उनकी भौंहों में हल्की-सी थरथरहाट हुई।
    
-उनसे बात करो कुछ। येन ने फिर से कहा- जल्दी करो...अब समय नहीं है!
    
-बाबूजी !!! मैंने बड़ी कातरता से कहा।
    
-क्या बात है?...चिल्ला क्यों रहे हो?
    
यह उनकी आवाज थी। एकदम मद्धम और धीमी। वे फिर से छटपटाने लगे थे। वे फिर से सांस लेने की कोशिश कर रहे थे। कुछ समय बाद ही वे फिर से पहले की तरह शांत हो गए।
    
-बाबूजी !!! इस बार मैं तब तक उन्हें बुलाता रहा, जब तक कि उन्होंने आखिरी सांस न ले ली।
    
अपनी वह कातर और मार्मिक आवाज मैं आज भी वैसे ही सुन सकता हूं। और जब भी मैं अपनी वे चीखें सुनता हूं, मुझे लगता है कि वह मेरे जीवन की शायद सबसे बड़ी गलती थी।

आलेख

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।