मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर देश में विरोध प्रदर्शनों की व्यापक लहर है। यूं तो ज्ञानेश कुमार की भूमिका और एस आई आर शुरू से विवाद के विषय रहे हैं। लेकिन पिछले दिनों ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के बाद आंदोलनों का नया सिलसिला शुरू हुआ है।
2 अक्टूबर को मुंबई और दिल्ली में दो बड़े प्रदर्शनों का आह्वान किया गया। दोनों ही प्रदर्शनों को प्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा अनुमति नहीं दी गयी। अनुमति न होने के बावजूद सैकड़ों लोग इन प्रदर्शनों में शामिल हुए। मुंबई शिवाजी पार्क में सभा हुई जिसमें बड़ी संख्या में छात्र-नौजवान शामिल रहे। दिल्ली जंतर-मंतर के प्रदर्शन को रोकने के लिए भारी पुलिस बल व देश कई स्थानों से अर्द्ध सैनिक बल बुलाकर तैनात किये गये। दर्जनों मेट्रो स्टेशन बंद कर दिये गये। लेकिन इस सब के बावजूद दिल्ली में बहुत बड़ा प्रदर्शन आयोजित हुआ। इनके साथ ही पिछले दिनों में इलाहाबाद, बैंगलोर, पटना सहित देश के कई शहरों में इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन हुए।
इस माह के शुरू से अभी तक कोई दिन ऐसा नहीं बीता जिस दिन दिल्ली की सड़क में मोदी-शाह-ज्ञानेश-एस आई आर के खिलाफ बड़े-बड़े प्रदर्शन न हुए हों। रोज प्रदर्शन, रोज दमन, रोज हिरासत की गवाह दिल्ली की सड़कें बनीं।
छात्र-नौजवानों के जुझारू तेवर देख मरियल से मरियल विपक्षी पार्टियों में भी कुछ दम आया। वे भी आंदोलन की लहर पर सवार होकर सत्ता पर पहुंचने के मंसूबे बांधने लगीं। चुनाव आयोग पर प्रदर्शन, राजघाट पर प्रदर्शन, सुप्रीम कोर्ट पर प्रदर्शन आदि विरोध प्रदर्शन विपक्षी पार्टियों द्वारा किये गये।
इस सबके बीच दिल्ली में 10 अक्टूबर का दिन खास रहा। यह दिन मोदी-शाह के जन के विरुद्ध युद्ध और फिर इसके जवाब में छात्र-नौजवानों, मेहनतकशों के जुझारू संघर्ष दोनों के लिए खास रहा। प्रदर्शन से घबराई केंद्र की मोदी सरकार ने पुलिस प्रशासन को निर्देश दिए कि किसी भी तरह यह प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। इसके लिए देश के दूसरे क्षेत्रों से सीआरपीएफ, आर ए एफ, बी एस एफ के जवानों को बुलाया गया। दिल्ली में लगभग 46,000 जवान पहले से मौजूद हैं। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस प्रशासन ने 9 अक्टूबर की रात 9ः00 से ही दिल्ली मेट्रो के 57 स्टेशनों को बंद करवा दिया। दिल्ली की ओर आने वाली 250 ट्रेनें रद्द करवा दीं। दिल्ली के कई बड़े बाजार कनाट प्लेस, पालिका बाजार, जनपद, चांदनी चैक आदि की सभी दुकानें बंद करवा दी गयीं। जंतर-मंतर तक पहुंचने वाले सभी रास्तों पर बैरिकेड खड़े कर, पुलिस तैनात कर दी। इससे भी कई किलोमीटर पहले बैरिकेड लगाकर वाहनों की कड़ी चेकिंग की गई ताकि कोई प्रदर्शन करने के लिए न पहुंच जाएं। यहां तक कि दिल्ली के बार्डरों को भी सील सा कर दिया गया। बैरिकेड लगाकर दिल्ली की तरफ आने वाले वाहनों की कड़ी चेकिंग की गई।
जंतर-मंतर के आस-पास कई किलोमीटर तक इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गयीं। तमाम बैरिकेडिंग, घेराबंदी, चेकिंग की बाधाओं के बावजूद सुबह के समय हजारों की संख्या में छात्र, नौजवान, महिला, मजदूर संगठनों के सदस्य-कार्यकर्ता व अन्य स्वतंत्र रूप से भी लोग जंतर-मंतर के समीप कनाट प्लेस तक पहुंच गए और अपना विरोध दर्ज कराया। दिल्ली पुलिस वहां लोगों को इकट्ठा नहीं होने दे रही थी और उन्हें बड़ी बेरहमी और जोर-जबरदस्ती से बसों में बिठाकर ले जा रही थी। लगभग 7000 प्रदर्शनकारियों को पुलिस पकड़ कर ले गई। कई प्रदर्शनकारियों को तो कई किलोमीटर दूर एक-दो घंटे बाद छोड़ दिया। पर सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को बवाना स्टेडियम जो यहां से लगभग 30 किलोमीटर दूर है, वहां ले जाकर अवैध हिरासत (डिटेन) में रखा गया। कई छात्र-नौजवानों को रात या सुबह ही घरों से पकड़ कर हिरासत में लिया गया।
हजारों की संख्या में पुलिस, अर्ध सैनिक बलों की तैनाती के बावजूद लोग लगातार छोटी-छोटी संख्याओं में कनाट प्लेस पहुंच रहे थे। वह बहुत ही निडर होकर पत्रकारों से अपनी बात कर रहे थे। वह जैसे ही नारे लगा रहे थे पुलिस वाले उन्हें पकड़ कर बस में ले जाते रहे। सारे दिन ऐसे ही चलता रहा। प्रदर्शनकारी इधर-उधर से वहां पहुंचते और कुछ लोगों को देखकर पुलिस उन्हें पकड़ कर ले जाती।
सोशल मीडियाकर्मियों को भी पुलिस ने परेशान किया और उन्हें रोका गया। कुछ छात्र-नौजवान और महिलाएं जो प्रदर्शन के लिए नहीं आए थे, उन्हें भी जबरदस्ती पकड़ कर ले गई। प्रदर्शन के दौरान कई ऐसी चीजें देखने को मिलीं जो लोगों के हौंसलों को दिखाती हैं। दोपहर के समय ‘परिवर्तनकामी छात्र संगठन’ और ‘इंकलाबी मजदूर केंद्र’ के सदस्य व कार्यकर्ता जो प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर की तरफ जा रहे थे तो उन्हें पहाड़गंज व नई दिल्ली रेलवे स्टेशन क्षेत्र में ही हिरासत में ले लिया गया। दिल्ली विश्वविद्यालय के पास पहुंचकर जब कुछ छात्राओं ने देखा कि बस में छात्र-नौजवानों को पकड़ कर ले जा रहे हैं तो वह बस के आगे खड़े हो गए और बस को रुकवा कर उन सबको हिरासत से छुड़़ा लिया।
इसी तरीके से शाम 5ः00 बजे के करीब कनाट प्लेस से पुलिस छात्र-नौजवानों को पकड़ कर बस में ले जा रही थी तो उस समय पहले एक वकील और फिर अन्य नौजवान बस के आगे खड़े हो गये और पुलिस की बस को रुकवा दिया और बस में से पकड़े गए सभी लोगों को बाहर निकलवा दिया।
प्रदर्शन में पुलिस प्रशासन और आर एस एस का गठजोड़ भी दिखाई दिया। कनाट प्लेस जहां पुलिस द्वारा बताया जा रहा था कि धारा 163 लगी हुई है और 5 से अधिक लोग इकट्ठा नहीं हो सकते वहां पर लगभग 150 लोग इकट्ठा होकर ‘जय श्री राम’! और ‘दिल्ली पुलिस जिंदाबाद’! के नारे लगा रहे थे। वे प्रदर्शन के लिए जा रहे छात्र-नौजवानों को पकड़कर उनके साथ बदतमीजी कर रहे थे और कुछ नौजवानों के साथ उन्होंने मारपीट भी की। एक बच्ची के साथ एक संघी गुंडे ने मारपीट की और पुलिस मूकदर्शक बनकर देख रही थी। जब कुछ मीडियाकर्मियों ने इसका विरोध किया तो उनके साथ भी बदतमीजी की गई।
दोपहर के समय दिल्ली हाट के पास वामपंथी व अन्य छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किया जिसका पुलिस को पहले से पता नहीं था और प्रदर्शन 1-2 घंटे चला। उसके बाद इन छात्रों को हिरासत में लेकर पुलिस कहीं और ले गई। पुलिस को इन्हें हिरासत में लेने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ी।
कनाट प्लेस के आस-पास और बैरिकेडों के पीछे छोटे-छोटे ग्रुप में हजारों छात्र-नौजवान मौजूद थे। हजारों की संख्या में पुलिस, आर ए एफ, सीआरपीएफ की मौजूदगी और दमन के बावजूद छात्र-युवा मैदान में डटे पड़े थे। 10 अक्टूबर के बाद भी आंदोलन का सिलसिला खत्म होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है।
प्रदर्शनों से घबराई फासीवादी मोदी सरकार ने जंतर-मंतर को ही प्रदर्शनों के लिए प्रतिबंधित कर दिया है। ‘काकरोच जनता पार्टी’ के कुछ लोगों द्वारा यहां तिरंगा झंडा फहराने पर पुलिस ने उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया।
फासीवादी अपने शासन को दमन और आतंक से चलाते हैं। यही उसके शासन के मूल चालक हैं। लेकिन किसी ने खूब ही कहा है- ‘‘इतना भी न डराओ कि डर ही निकल जाये’’। आज लगभग वही स्थिति हो गयी है। जितना दमन हो रहा है आंदोलन उतना ही विस्तार पा रहा है। पुलिस का डंडा, हिरासत, फासीवादी गुंडों के सामने लोग निडरता से खड़े हो रहे हैं।
लोगों की निडरता-जुझारूपन हिन्दू फासीवादियों के बुरे संकेत हैं। इसे वे भी समझ रहे हैं। इसीलिए वे भयभीत भी हैं। भय के मारे फासीवादी जो भी कर रहे हैं वह उनके लिए उलटा ही पड़़ जा रहा है। और आंदोलन को विस्तारित ही कर रहा है। फिलहाल मौजूदा आंदोलन न सिर्फ जारी है बल्कि विस्तारित होता जा रहा है।