30 सितम्बर को कर्नाटक के बंगलौर में पी एफ निकासी के नियमों में किये गये बदलावों के विरोध में महिला मजदूरों ने प्रदर्शन किये। ज्ञात हो कि सरकार ने 1 जुलाई 2026 से पी एफ निकासी से सम्बन्धित नियमों में बदलाव किये हैं जिसको लेकर मजदूरों के बीच भारी आक्रोश है। 2016 में भी केन्द्र की मोदी सरकार ने पी एफ निकासी के नियमों में बदलाव किया था जिसको गारमेंट क्षेत्र की महिला मजदूरों के भारी विरोध के कारण तब वापस लेना पड़ा था। मजदूरों के भारी विरोध प्रदर्शन के बाद कर्नाटक के श्रम मंत्री संतोष लाड़ ने श्रमिक यूनियनों के साथ वार्ता बुलाई और केन्द्र सरकार को उनकी मांगें प्रेषित कर दीं लेकिन अभी तक केन्द्र सरकार या पी एफ विभाग ने इन नियमों को वापस लेने के संबंध में कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया है।
29 जून 2026 को घोषित नए नियमों (जो 1 जुलाई 2026 से प्रभावी हुए) के तहत नौकरी छोड़ने पर श्रमिक तुरंत केवल 75 प्रतिशत पीएफ ही निकाल सकते हैं, और बाकी 25 प्रतिशत के लिए उन्हें 12 महीने (1 साल) का इंतजार करना होगा। इसके अलावा, जिन कर्मचारियों की सेवा 10 साल से कम है, उनके लिए कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) का पैसा निकालने के लिए 36 महीने (3 साल) की प्रतीक्षा अवधि तय कर दी गई है।
पी एफ मामले को लेकर गारमेंट क्षेत्र की महिला मजदूरों का संघर्ष उस समय शुरू हुआ जब मोदी सरकार ने 2016 में पी एफ निकासी सम्बन्धित नियमों में बदलाव किया था। इस नियम के तहत कोई भी कर्मचारी नौकरी छोड़ने पर केवल अपना हिस्सा ही निकाल सकता था। रिटायरमेंट की अवधि 58 वर्ष की आयु पर ही वह पीएफ खाते से नियोक्ता (मालिक) वाला हिस्सा निकाल सकता था।
पी एफ निकासी के सम्बन्ध में किये गये इस बदलाव का विरोध बैंगलोर की शाही एक्सपोर्ट की महिला मजदूरों से शुरू हुआ और देखते-देखते बैंगलौर की बाकी फैक्टरियों (विशेषकर गारमेंट क्षेत्र की) में फैल गया। लाखों महिलायें इस बदलाव का विरोध करने सड़क पर उतर पड़ीं। पुलिस के भारी दमन का सामना करते हुए भी वे पीछे नहीं हटीं। महिला मजदूरों के इस अभूतपूर्व और उग्र विरोध के आगे घुटने टेकते हुए केंद्र सरकार को महज 24 से 48 घंटों के भीतर उस विवादित अधिसूचना को पूरी तरह वापस लेना पड़ा था।
आज के समय में मजदूरों की जो आर्थिक स्थिति है उसमें पी एफ की राशि अब उनके सेवानिवृत्ति के बाद के समय काम आने वाली राशि नहीं रह गयी है बल्कि बच्चों को पढ़ाने, शादी-ब्याह, स्वास्थ्य, नौकरी छूटने पर बेरोजगारी के समय खर्च होने वाली राशि बनकर रह गयी है। ऐसे में पी एफ के पैसे को वे लम्बे समय तक के लिए बचाकर नहीं रख सकते। लेकिन 2016 का नियम हो या 2026 के नियम हों, वे मजदूरों को उनके पी एफ की राशि तक पहुंच को रोकते हैं। ऐसे में मजदूरों द्वारा ऐसे नियमों का विरोध लाजिमी है।
ईपीएफओ विभाग नियमों के पक्ष में अपने तर्क देते हुए कहता है कि पी एफ की राशि कर्मचारी के सेवानिवृत्ति के समय काम आने वाली राशि है। पहले के नियमांे के अनुसार वे अपना पूरा पैसा निकाल सकते थे जिससे जरूरत के समय उनके पास पैसा नहीं बचता था इसलिए नियमों में बदलाव किया गया है ताकि उनके पास 25 प्रतिशत की राशि बची रहे। यह ठीक वैसी ही बात है कि किसी व्यक्ति को भूख आज लगी हो और उसे खाना उस समय मिले जब वह भूख से मर गया हो। जब मजदूरों की तनख्वाह आज के खर्चे के लिए पूरी ही नहीं पड़ रही है तो वे पी एफ की राशि को निकालेंगे ही। वैसे भी सेवानिवृत्ति जैसे शब्द आज मजदूर के लिए बेमानी हो चुके हैं। ठेके की नौकरी में तो उसे जब तक जिन्दा रहना है तब तक काम करना ही होगा।
दरअसल पूंजीपतियों की गिद्ध नीयत मजदूरों और कर्मचारियों के पी एफ में जमा धन पर है। मोदी सरकार लगातार कोशिश कर रही है कि पूंजीपति वर्ग की इस इच्छा को पूरा किया जाए लेकिन मजदूरों खासकर महिला मजदूरों के संघर्ष इसमें रोडे अटका दे रहे हैं।