युद्ध

पाक-अफगान टकराव

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हाल ही में पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान-अफगानिस्तान के बीच लम्बे समय से जारी टकराव के खुले युद्ध के स्तर पर पहुंचने की घोषणा कर दी। 22 फरवरी से दोनों देशों की ओर

युद्ध के सौदागर जमकर काट रहे चांदी -अशोक स्वैन

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जून 2025 में, उप्पसला कॉन्फ्लिक्ट डेटा प्रोग्राम (यूसीडीपी) ने जानकारी दी कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद जबसे इसने डेटा संग्रह शुरू किया, तब से देश-आधारित संघर्षों की संख्या

पश्चिम एशिया में इजरायली युद्ध का विस्तार और वैश्विक भू राजनीति

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इजरायल द्वारा कतर पर हमले की निंदा दुनिया भर में व्यापक पैमाने पर हुई। इजरायल दुनिया के पैमाने पर अलग-थलग पड़ गया। इसके साथ ही जिन देशों ने अब्राहम समझौता इजरायल के साथ किया था, वह अब कमजोर पड़ने लगा है। इजरायल के साथ साउदी अरब और अन्य अरब देशों की रिश्तों के सामान्यीकरण की प्रक्रिया बाधित हुई।

दुनिया भर में हत्यारे इजरायल का बढ़ता विरोध

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इजरायली शासकों द्वारा फिलिस्तीन में किये जा रहे नरसंहार का विरोध दुनिया भर में बढ़ता जा रहा है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र महासभा में इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के सम

ईरान पर अमेरिकी हमले के निहितार्थ

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बहुत कम लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि इजरायल द्वारा गाजा में जो नरसंहार किया जा रहा है उसके लिए हथियार केवल अमेरिकी साम्राज्यवादी नहीं दे रहे हैं। फ्रांसीसी, जर्मन और ब्रिटिश साम्राज्यवादी भी यह हथियार दे रहे हैं। फर्क बस इतना है कि अमेरिकी साम्राज्यवादी नंगे रूप में गाजा में नरसंहार का समर्थन करते हैं जबकि यूरोपीय साम्राज्यवादी इस पर लीपा पोती करते हैं। यह भी याद रखना होगा कि ईरान पर इजरायली हमले को जर्मन चांसलर ने यह कह कर जायज ठहराया कि इजराइल दुनिया के हित में ‘गंदा काम’ कर रहा है। 

गाजा में जारी नरसंहार

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गाजा में धूर्त व क्रूर जियनवादी, फासीवादी इजरायली शासकों का नरसंहार जारी है। यह नरसंहार हमास के 7 अक्टूबर 2023 के हमले के पहले भी जारी था और इस हमले के बाद तो मानो सारी ह

रूस-यूक्रेन युद्ध व्यापक युद्ध की ओर बढ़ रहा है?

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यूरोपीय साम्राज्यवादी रूस पर और ज्यादा प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर चुके हैं। वे रूस के ऊर्जा क्षेत्र में और बैंक क्षेत्र में और कड़े प्रतिबंधों को लगा रहे हैं। वे रूसी साम्राज्यवादियों को आर्थिक तौर पर पंगु बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके साथ ही वे यूक्रेन को युद्ध में भारी मदद कर रहे हैं। 

इजरायल का ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला

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इजरायल ने ईरान के परमाणु व मिसाइल ठिकानों पर अपनी मिसाइलों से क्रूर हमला बोल दिया है। ‘आपरेशन राइजिंग लायन’ नामक इस सैन्य अभियान ने दुनिया में जंग का एक नया केन्द्र खुलने

युद्ध और युद्ध का कारोबार

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आधुनिक जमाने में यह आम परिघटना रही है कि युद्धों से यदि आम जनता की तबाही हुई है तो इससे पूंजीपतियों ने खूब मुनाफा भी कमाया है। यह सभी देशों में होता रहा है। भारत में देशी

नूरा-कुश्ती में कौन जीता?

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आपातकाल के ठीक पहले अमृत नाहटा ने एक फिल्म बनायी थी- ‘किस्सा कुर्सी का’। इस फिल्म को सेंसर बोर्ड द्वारा अनुमति नहीं मिली। कहा जाता है कि आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने इस

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।