हूती-सऊदी संघर्ष
अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर हमले से शुरू होकर पश्चिम एशिया में टकराव कई कोणों से बढ़ने लगा है। इजरायल व लेबनान के हिजबुल्ला के बीच संघर्ष जहां अमेरिका-ईरान युद्ध की शुरू
अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर हमले से शुरू होकर पश्चिम एशिया में टकराव कई कोणों से बढ़ने लगा है। इजरायल व लेबनान के हिजबुल्ला के बीच संघर्ष जहां अमेरिका-ईरान युद्ध की शुरू
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
अमेरिका-ईरान के बीच जारी सैन्य टकराहटों के खत्म होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। यद्यपि दोनों देशों के बीच वार्ताओं का क्रम कई बार टूटने के बावजूद फिर नये सिरे से शुरू हो
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
ईरान पर युद्ध थोपने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बड़ी अकड़ में थे। टीवी पर, सोशल मीडिया पर, रैलियों में- हर जगह वही अंदाज। अकड़ ऐसी कि कई बार मुंह और शरीर तक टेढ़ा हो जाता था।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।
पाकिस्तान में अमेरिका-ईरान के बीच पहले चक्र की वार्ता के विफल हो जाने के बाद अमेरिका ने होरमुज पर अपनी घेरेबंदी की घोषणा कर दी। इस घेरेबंदी के लागू होने से अमेरिका ने होर
ईरान पर अमेरिकी इजरायली हमलों के खिलाफ दुनिया भर में तीखे हो रहे मजदूर मेहनतकश जनता के आक्रोश के बीच ईरान और अमेरिका दो सप्ताह के युद्ध विराम पर सहमत हुए हैं। अमेरिकी साम
अमेरिकी-इजरायली शासकों द्वारा 28 फरवरी को जब ईरान पर हमले बोलना शुरू किया गया तो हमलावरों के साथ-साथ दुनिया में किसी को भी अंदाजा नहीं था कि यह जंग एक माह से अधिक समय बीत
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।