साम्राज्यवाद

वेनेजुएला: भीषण भूकम्प और अमरीकी हस्तक्षेप

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24 जून को वेनेजुएला में दो बार तेज भूकम्प आया। इस भूकम्प में अब तक लगभग डेढ़ हजार लोगों के मारे जाने व 50 हजार से अधिक के लापता होने की खबर है। सर्वाधिक तबाही सैन सेबेस्टि

अल्बानिया में जेरेड कुशनर द्वारा जमीन कब्जाने का विरोध

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अल्बानिया बाल्कन का एक छोटा सा देश है। यहां पर भी, जब पूर्वी यूरोप के देशों की संशोधनवादी सत्ताओं का पतन हुआ, उसी समय केे आस-पास छुट्टा पूंजीवाद आ गया। तब से अल्बानिया मे

अमेरिका और चीन: थ्यूसीडाइड्स फांस?

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शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

होरमुज नाकाबंदी के बीच ट्रंप की चीन यात्रा का अर्थ

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इस वार्ता के चाहे जो भी परिणाम हों, लेकिन एक बात निश्चित है कि अमरीकी साम्राज्यवाद का कमजोर होते जाना तय है और इसके प्रतिद्वंद्वी के बतौर चीनी साम्राज्यवाद का उभरना और रूसी व चीनी साम्राज्यवादियों का गठबंधन मजबूत होते जाना साफ दिखाई पड़ रहा है। 

अंतर्राष्ट्रीय नियम-कानून, व्यवस्था और अव्यवस्था

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देशों के बीच संबंधों में भी अंततः ताकत ही निर्णायक होती है। आर्थिक और सामरिक दोनों मिलकर यह तय करते हैं। तात्कालिक तौर पर सामरिक ताकत के महत्वपूर्ण होते हुए भी अंततः आर्थिक ताकत ज्यादा महत्वपूर्ण साबित होती है। 

अमरीका-ईरान समझौता वार्ता असफल- आगे क्या?

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लेकिन इसके बावजूद, अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी रणनीतिक पराजय स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। यदि इसे वह स्वीकार कर लें तो उसकी धौंसपट्टी, हमले, हुकूमत परिवर्तन की सारी कोशिशों पर पलीता लग सकता है? वैसे भी दुनिया भर में उसकी साख गिर रही है और प्रभाव भी कमजोर होता जा रहा है। 

लेबनान में गाजा जैसा जातीय सफाया -अशोक स्वैन

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जब दुनिया की नजरें डर और अविश्वास के साथ डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के खतरनाक टकराव पर टिकी थीं, लेबनान में हो रही तबाही दुनिया के ध्यान से दूर रही। इजराइल अपने उत्तरी पड़ोसी क

इजरायल-अमेरिका और धर्मयुद्ध

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पूंजीवादी सोच की यह समस्या है कि वह अपने विश्लेषण में स्वयं पूंजीपति व्यवस्था के मूलभूत चरित्र को कभी संज्ञान में नहीं लेती। वह कभी स्वीकार नहीं करती कि यह अन्याय-अत्याचार और शोषण वाली वर्गीय व्यवस्था है जो पूंजीपति वर्ग के हित में उसके हिसाब से चलती है। कि छिपी या खुली हिंसा इसका अनिवार्य तत्व है।

साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था में बदलता शक्ति संतुलन

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अमरीकी साम्राज्यवादी और यहूदी नस्लवादी इजरायली शासकों ने खाड़ी के देशों के शासकों को ईरान के विरुद्ध युद्ध में प्रत्यक्ष तौर पर भागीदारी कराने की पूरी कोशिश की। वे इस बात के लिए उनको उकसाते रहे कि ईरान ने उनके देश पर हमला किया है, इसलिए उन्हें इस हमले का विरोध करना चाहिए।

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।