घृणा के बारे में कुछ शब्द -राजेश जोशी
घृणा यूं कोई बहुत अच्छी चीज नहीं है
बहुत खून पी जाती है और खा जाती है
फेफड़ों की बहुत सारी शक्ति
बहुत सारे सपने, भोलापन और नींद कई रातों की
घृणा यूं कोई बहुत अच्छी चीज नहीं है
बहुत खून पी जाती है और खा जाती है
फेफड़ों की बहुत सारी शक्ति
बहुत सारे सपने, भोलापन और नींद कई रातों की
बहुतेरे बहुत अधिक हुआ करते हैं
वे गायब हो जाएं, बेहतर होगा।
लेकिन वह गायब हो जाये, तो उसकी कमी खलती है।
अब तक छिपे हुए थे उनके दांत और नाखून।
संस्कृति की भट्ठी में कच्चा गोश्त रहे थे भून।
छांट रहे थे अब तक बस वे बड़े-बड़े कानून।
नहीं किसी को दिखता था दूधिया वस्त्र पर खून।
खाने की टेबल पर जिनके
पकवानों की रेलमपेल
वे पाठ पढ़ाते हैं हमको
‘संतोष करो, संतोष करो।’
ओडिशा के किसी दूर-दराज के गांव में
कहीं, कुछ छोटे नोट,
शायद
इधर-उधर से काम करके
बैंक में जमा हो गए होंगे
शायद किसी छळव् के सेविंग्स ग्रुप
जैसे निहाई पर लोहे का पत्थर ढाला जाता है
वैसे ही हम नए दिन ढालेंगे
ताकत और पसीने से नहाए हुए
हम पाताल में उतरेंगे
और धरती के गर्भ से नया वैभव जीत लाएंगे
ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आखिर
जंग मशरिक में हो कि मगरिब में
अम्न-ए-आलम का ख़ून है आखिर
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूह-ए-तामीर जख्म खाती है
ऐ औरत!
वह तुम्हारा ही रक्त है
जो तुम्हारे स्वप्न और पुरुष की उत्कट आकांक्षाओं को
शिशु के रूप में परिवर्तित करता है।
तुम्हारी उस मुस्कुराहट पर
जो तुम ‘संधि-पत्र’ (ज्तमंजल) पर हस्ताक्षर करते वक्त
कैमरों को दिखा रहे थे।
इतिहास गवाह है-
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।
जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।