काकरोच पार्टी का आमरण अनशन
दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जून से शुरू हुआ काकरोच जनता पार्टी का धरना प्रदर्शन जारी है। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ शुरू हुआ यह प्रदर्शन 28 ज
दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 जून से शुरू हुआ काकरोच जनता पार्टी का धरना प्रदर्शन जारी है। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ शुरू हुआ यह प्रदर्शन 28 ज
भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा बेरोजगार युवाओं को काकरोच कहे जाने की प्रतिक्रिया में काकरोच जनता पार्टी पैदा हुई थी। अमेरिकावासी अभिजीत दिपके द्वारा सोशल मीडिया पर व्यंग्
संघ परिवार और मुख्य धारा का मीडिया प्रधान सेवक के 12 सालों के कार्यकाल पर मंत्रमुग्ध है। ‘महामानव’ का इस पर आत्ममुग्ध होना स्वाभाविक है। इस आत्ममुग्धता को देखकर शेष हिंदू
जब से ममता बनर्जी पं.बंगाल का चुनाव हारी हैं तब से उनकी पार्टी में जबरदस्त टूटन-फूटन का दौर चल रहा है। कोई नेता पार्टी छोड़कर भाग रहा है तो कोई नेता अलग गुट बनाकर पार्टी म
जैसा कि तय ही था कि जैसे ही पांच राज्यों में चुनाव निपटेंगे वैसे ही गैस, पेट्रोल-डीजल के दामों में आग लगेगी और महंगाई आसमान छूने लगेगी। मई माह के दूसरे पखवाड़े में पेट्रोल-डीजल सौ रुपये प्रति लीटर या उससे भी ज्यादा तक जा पहुंचे। बढ़ती महंगाई के बीच देश का आर्थिक संकट गहराता गया है और उसके साथ सामाजिक संकट भी गहरा रहा है। और इस गहराते सामाजिक संकट ने समाज के हर वर्ग और तबके को मजबूर कर दिया है कि वह अपनी प्रतिक्रिया दे।
आज से ठीक पंद्रह साल पहले गर्मियों में तथाकथित अन्ना हजारे आंदोलन शुरू हुआ था जिसने देश के लाखों-लाख युवाओं को उद्वेलित किया था। वो युवा इस उम्मीद से इस आंदोलन से जुड़े थे
9 मई को पं.बंगाल का नया मुख्यमंत्री एक पूर्व कांग्रेसी, एक पूर्व तृणमूली बन चुका है। इस आदमी का नाम शुभेन्दु अधिकारी है। इससे पहले असम का मुख्यमंत्री एक पूर्व कांग्रेसी ह
पिछले दिनों अमेरिकी सरगना डोनाल्ड ट्रम्प ने माइकल सैवेज की एक टिप्पणी सोशल मीडिया पर साझा की। यह टिप्पणी अमेरिका में पैदायशी नागरिकता के कानून का विरोध करते हुए की गयी थी
अब भाजपा के काले कारनामों का ताजा शिकार आम आदमी पार्टी (आप) बनी है। आप के राज्यसभा के दस सांसदों में से सात सांसदों ने भाजपा का दामन थाम लिया है। राघव चड्ढा जो कल तक भाजप
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।
जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।