पुस्तक समीक्षा

एक जरूरी उपन्यास ‘मातीगारी’

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यह कहानी अफ्रीकी देश नाईजीरिया के लेखक न्गुगी वा थ्योंगो द्वारा लिखे गये उपन्यास ‘मातीगारी’ की है। इस उपन्यास के नायक का नाम भी मातीगारी है। कहानी उस दौर की है जब नाईजीरिया एक औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत था। वहां पर जर्मनी, अमेरिकी, फ्रांस तथा अन्य देशों के साम्राज्यवादी लुटेरे इस देश की प्राकृतिक सम्पदा को लूट कर अपने देशों में ले जाते थे और इस देश की जनता हमेशा भुखमरी, अकाल, अशिक्षा और अकाल मृत्यु से जूझती रहती थी। यह देश प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर होने के बाद भी हमेशा एक गरीब और लाचार देश बना रहा। 
    

असली अमेरिका कौन है? -मदन मोहन पाण्डेय

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यूरोपियन व्यापारियों ने मूल अमेरिकियों का संहार तीन तरह से किया। एक लड़ाइयां में, (जिसका अभी जिक्र किया है), दूसरा उन्हें गुलाम बनाकर नारकीय दशाओं में रखकर, तीसरा, स्वयं यूरोप से वहां लाई गई बीमारियों द्वारा। संहार के दूसरी प्रकार के बाबत गालिआनो इस प्रकार बताते हैं, ‘‘तीन सदियों (16वीं से 18वीं) के दौरान पोतोसी (बोलीविया का चांदी खनन केंद्र) के सेर्रोरिको ने 80 लाख जिंदगियों को लील लिया। मूल निवासियों को औरतों और बच्चों समेत उनके कृषिगत समुदायों से नोच लिया गया और उन्हें सेर्रां (चांदी की खानों) में भेज दिया गया। उस बेहद ठंडे बीहड़ में गए हर दस में से सात कभी वापस नहीं आए। स्पेनवासी मजदूरों की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों में सैकड़ों मील तक घूमते थे। गुलाम मजदूरों में बहुत से पोतोसी पहुंचने से पहले रास्ते में ही मर जाते थे। लेकिन वह खानों में काम करने के भयंकर हालात थे जिन्होंने ज्यादातर लोगों को मारा। बेगार और गुलामी की भयानकता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि मूलवासी उनसे बचने के लिए सैकड़ां की तादाद में सामूहिक आत्महत्याएं कर लेते थे।

पुस्तक समीक्षा : ‘‘फैक्टरी जापानी प्रतिरोध हिन्दुस्तानी’’

यह किताब मारुति सुजुकी के मजदूरों के संघर्ष का एक जीवंत दस्तावेज है। यह किताब उनके संघर्षों का ही नहीं बल्कि उनके साथ हुए अन्याय व अत्याचार का भी दस्तावेज है। इसके साथ यह भारतीय न्याय (अन्याय) व्यवस्था और पुलिस की जांच व कार्यप्रणाली का भी जीवंत दस्तावेज है। यह किताब मजदूरों के कठिन जीवन का ही नहीं बल्कि कैसे उनके बेहतर जीवन के ख्वाब और प्रयास धूल धूसरित हो जाते हैं का भी एक दस्तावेज है।

आलेख

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।