औरत की ज़रूरत -शुभा

मुझे संरक्षण नहीं चाहिए 
न पिता का 
न भाई का 
न माँ का 
जो संरक्षण देते हुए 
मुझे कुएँ में धकेलते हैं 
और मेरे रोने पर तसल्ली देने आते हैं 
हवाला देते हैं अपने प्रेम का 

मुझे राज्य का संरक्षण भी नहीं चाहिए 
जो एक रंगारंग कार्यक्रम में 
मुझे डालता है और 
भ्रष्ट करता है 

मुझे चाहिए एक संगठन 
जिसके पास तसल्ली न हो 
जो एक रास्ता हो 
कठोर लेकिन सादा 

जो सच्चाई की तरह खुलते हुए 
मुझे खड़ा कर दे मेरे रू-ब-रू 

जहाँ आराम न हो लेकिन 
जोखिम अपनी ओर खींचते हों 
लगातार 

जहाँ नतीजे तुरंत न मिलें 
लेकिन संघर्ष छिड़ते हों लंबे 

एक लंबा रास्ता 
एक गहरा जोखिम 
रास्ते की तरह खुलती 
एक जटिल सच्चाई मुझे चाहिए। 
साभार : www-hindwi.org

आलेख

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।