हावर्ड जिन : जनता का इतिहासकार

हावर्ड जिन : जनता का इतिहासकार

24 अगस्त जयंती पर

हावर्ड जिन अमेरिका के इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता थे। उनकी लिखी किताबें पुरी दुनिया में चर्चित हुई। हावर्ड जिन की किताबों की प्रसिद्धि का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि उनके द्वारा लिखित "अ पीपल्स हिस्ट्री ऑफ़ द यूनाइटेड स्टेट्स" (1980) अमेरिकी इतिहास की सबसे लोकप्रिय किताबों में से एक है। जिसकी हाल ही में 40 लाख से ऊपर प्रतियां बिक चुकी हैं। 

हावर्ड जिन ने जनांदोलनों के इतिहास को लोकप्रिय बनाया साथ ही उन्होंने अश्वेतों, मजदूरों, महिलाओं, मूल अमरीकियों तथा उत्पीड़ित जनता के इतिहास को अपने लेखन में शामिल किया। ये सभी उत्पीड़ित लोग अब तक अमेरिकी इतिहास के पाठयक्रम से गायब थे।

हावर्ड जिन ने द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिया था इसलिए वो युद्ध की विभीषिका को समझते थे। साम्राज्यवादी देशों द्वारा युद्धों का इस्तेमाल अपना मुनाफा बढ़ाने की साजिशों को भी वो समझते थे। इन चीजों ने उन्हें युद्ध विरोधी योद्धा बना दिया। इतना ही नहीं जिन उन प्रमुख इतिहासकारों में से एक थे जिन्होंने वियतनाम युद्ध में अमेरिक की भूमिका की कड़ी आलोचना करते हुए अपनी महत्वपूर्ण युद्ध विरोधी प्रस्थापनाएं प्रस्तुत की। अमरीकी पूंजीवाद को निशाने पर लेते हुए उन्होंने आर्थिक, लैंगिक, नस्लीय असामनता के लिए इसे ही ज़िम्मेदार माना। वो सही मायने में जनता के इतिहासकार थे। आज उनकी जयंती पर हमारा सलाम।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।