नक्शे में निशान -अलिंद उपाध्याय

दुनिया के नक्शे में

चौकोर-गोल-तिकोने निशानों से

दिखाए जाते हैं वन, मरुस्थल, नदियां, डेल्टा, पर्वत, पठार

दिखाया जाता है इन्हीं से

पायी जाती है कहां-कहां

दोमट, लाल, काली या किसी और प्रकार की मिट्टी

कविता की मिट्टी में सरहद नहीं होती

निशान नज़र आते हैं

किसी न किसी सरहद में ही

 

दिखायी जाती हैं इन्हीं डिज़ाइनर निशानों से

लोहा, कोयला, सोना, तांबा, अभ्रक और हीरे की खानें

लेकिन खदानों के श्रमिकों की पीड़ा

और उनके मालिकों की विलासिता

नहीं दिखा सकता है कोई निशान

 

ये दिखाते हैं हमें

तेल और गैस के प्रचुर क्षेत्र

कोई निशान नहीं दिखाता इनके इर्द-गिर्द का वह क्षेत्र

जहां मिट गया आबादी का नामोनिशान

अमेरिकी बमबारी से

 

एक काला गोल निशान दिखता है

जहां कहीं भी होती है राजधानी

कुछ बडे़-बड़े अक्षरों में नज़र आती है जो

वहीं तैयार किया जाता है दुनिया का नक्शा

जहां दुनिया के ताकतवर देश

उनके हिसाब से नहीं चलने वाले देशों पर

लगाते हैं निशान

अगला निशाना साधने के लिए।

साभार : http://www.anunad.com/

आलेख

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

/piketi-ka-global-justice-project-samraajyavad-ki-pairokari

जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।