ऑस्ट्रेलिया में अप्रवासियों के खिलाफ प्रदर्शन और हिंसा

कुछ दिन पहले 31 अगस्त को ऑस्ट्रेलिया के कई शहरों में अप्रवासियों के खिलाफ प्रदर्शन हुए। सिडनी, ब्रिस्बेन, पर्थ, कैनबरा, एडिलेड जैसे शहरों में ये प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारी हाथों में ‘‘मार्च फॉर ऑस्ट्रेलिया’’ बैनर लिए थे। ऑस्ट्रेलिया के दक्षिणपंथी समूहों द्वारा इन प्रदर्शनों के लिए सोशल मीडिया में लम्बा अभियान चलाया गया जिसमें इन्होंने देश की समस्याओं के लिए अप्रवासियों को जिम्मेदार बताया और ऑस्ट्रेलिया की ‘अपनी पहचान’ की बात कही।

मेलबर्न में तो अप्रवासियों के खिलाफ प्रदर्शनकारी और अप्रवासियों के समर्थक प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प भी हुई। पुलिस को प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए मिर्च स्प्रे और लाठियों का प्रयोग करना पड़ा।

ऑस्ट्रेलिया में भारतीय समूह के लोग मुख्य निशाने पर हैं। दक्षिणपंथी समूहों द्वारा सोशल मीडिया पर मैसेज और पर्चे भेजकर ऑस्ट्रेलिया में भारतीय प्रवासियों को निशाना बनाया। आंकडे बताते हैें कि ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों की संख्या पिछले 10 सालों में दो गुना से ज्यादा बढ़कर 8,45,800 हो गयी है। ऑस्ट्रेलिया में बसने वालों में ब्रिटेन के बाद भारतीय दूसरे स्थान पर पहुंच गये गये हैं।

ऑस्ट्रेलिया में इस तरह के प्रदर्शन और हिंसा अभी तक कोई आम परिघटना नहीं है। लेकिन यह बढ़ती पर अवश्य दिखती है। 2009 में एक भारतीय छात्रा की पिटाई, 2010 में एक अन्य भारतीय युवक की पिटाई और फिर 2025 में कार पार्किंग के विवाद पर एक भारतीय की पिटाई की घटना पिछले दिनों में देखी गयी है। भद्दी नस्लीय गालियों में झलकती नफरत साफ दिखाई दी।

ऑस्ट्रेलिया की लेबर पार्टी सरकार ने इन प्रदर्शनों की निंदा की है। इसे दक्षिणपंथी ताकतों का कृत्य बताया। ऑस्ट्रेलिया में अप्रवासी नीति की शर्तें कड़ी नहीं हैं। ऑस्ट्रेलिया में अपने कारणों से विदेशी लोगों को स्वागत ही रहा है। विभिन्न जगहों से यहां लोग बसे हैं। इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां बहुसांस्कृतिक मामलों को देखने के लिए अलग से मंत्रालय है।

इस सब के बावजूद पिछले समय में ऑस्ट्रेलिया जैसे देश में अप्रवासियों के प्रति नफरत भी बढ़ी है। इस नफरत का सीधा सम्बंध देश में बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी आदि समस्याओं से है। यह समस्याएं बढ़ रही हैं और इन्हें भुनाने वाली दक्षिणपंथी ताकतेें भी बढ़ रही हैं। ऑस्ट्रेलिया फर्स्ट नेटवर्क, नेशनल सोशलिस्ट नेटवर्क, द यूनाइटेड पेैट्रियट्स फ्रंट, द सनसिटी रिबेल्स जैसे दक्षिणपंथी समूह की ताकत निरंतर बढ रही है। समाज में इनकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। 2022 के चुनाव में वन नेशन पार्टी के दो और यूनाइटेड ऑस्ट्रेलिया पार्टी का एक सीनेटर बना है।

दक्षिणपंथियों का उभार भले ही संख्या की नजर से आज बहुत कम दिख रहा हो लेकिन समाज में बढ़ते पूजीवादी संकट के कारण ये ताकतें तेजी से ताकतवर हो सकती हैं। भारत का उदाहरण हमारे सामने है। 1984 में दो सीटों वाली भाजपा 2014 आते-आते पूरे समाज में एक असाध्य बीमारी की तरह चिपक गयी है।

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