सम्भल के बाद अब फतेहपुर में दंगा भड़काने की कोशिश

यूपी के फतेहपुर जिले में 11 अगस्त 2025 को आबूनगर इलाके के सदर कोतवाली के पास 200 साल पुराने अबाब अब्दुल समद के मकबरे पर हिन्दू कट्टरपंथियों द्वारा हमला किया गया। करीब 2000 लम्पट कार्यकर्ता पुलिस बैरिकेड्स को तोड़ कर अंदर घुस गए और मकबरे को तोड़ने लगे। यह सब पुलिस देखती रही। मकबरे की छत पर भगवा झंडा लहराया गया, मकबरे के अंदर तोड़-फोड़ की गयी और तनाव पैदा करने के लिए मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नफरती गलियां तथा उकसावे भरी कार्यवाही की जाती रहीं और पुलिस तमाशा देखती रही।

बजरंग दल, हिन्दू महासभा, भाजपा के पूर्व विधायक व भाजयुमो आदि संगठनों के नेता और उसके हजारों लम्पटों ने यहाँ उत्पात मचाया। वे दावा कर रहे हैं कि यह मकबरा नहीं बल्कि 500 सालों से ठाकुर जी का प्राचीन मंदिर है। लाठी डंडों से लैस हिन्दू कट्टरपंथी मुस्लिम समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाते रहे व गालियां देते रहे।

अराजक लम्पटों ने डाक बंगले चौराहे पर जाम लगा दिया। अंत में अपनी साख बचाने के लिए पुलिस प्रशासन को प्रयागराज हेड क्वार्टर व जोन के 8 जिले की फोर्स मंगानी पड़ी, तब जाकर इलाका खाली कराया गया। कुछ लोगों पर एफआईआर हुई है लेकिन इन लम्पटों को सत्ता के संरक्षण मिला है। इसलिए पहले की तरह कोई कार्यवाही नहीं होगी।

सत्ता का संरक्षण पाकर स्थानीय नेता व लंपट तत्व इस तरीके का उत्पात मचा रहे हैं और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर वे अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं।

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।