स्कूली सुविधाओं की मांग को लेकर जेन अल्फा छात्रों का प्रदर्शन

Published
Sun, 01/04/2026 - 15:50
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15 अगस्त को जब प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से देश को सम्बोधित कर रहे थे तो वे ऐसा महसूस कराने की कोशिश कर रहे थे कि सब चंगा है।

हकीकत यह है कि पिछले दिनों समाज का हर वर्ग अपनी समस्याओं को लेकर सड़क पर उतरा है। यहाँ तक कि एक महीने से सरकारी स्कूलों की बदहाली (अध्यापकों की कमी, स्कूल बिल्डिंग, पानी, शौचालय की व्यवस्था, स्कूल तक पहुँचने के लिए सड़क का निर्माण आदि) को लेकर उसमें पढ़ने वाले छात्र सड़कों पर प्रदर्शन करने को बाध्य हो हुए हैं।

ताज़ा मामला उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का है। यहाँ जय प्रकाश नारायण सर्वोदय बालिका विद्यालय की छात्राओं ने स्कूल में विज्ञान, गणित और इंग्लिश के अध्यापकों की की को लेकर प्रदर्शन किया। साथ ही उन्होंने हॉस्टल की वार्डन और अध्यापिकाओं के व्यवहार को लेकर भी आपत्ति जताई।

किसी तरह प्रशासन ने इन्हें समझा बुझाकर वापिस तो भेज दिया लेकिन जाते जाते छात्राओं ने दृढ़ता से कहा अगर उनकी समस्याएं हल न की गयीं तो वे फिर आएंगी।

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।