युद्ध नहीं शांति

Published
Wed, 04/01/2026 - 15:50
/war-nahin-shanti

यदि आप दूर अपने ड्राइंग रूम में बैठकर
युद्ध का मजा ले रहे हैं
आसमान से बस्तियों, स्कूलों और अस्पतालों पर
गिरती मिसाइलों का 
आतिशबाजी की तरह आनंद ले रहे हैं
अगर आप को मलबे में दबे बूढ़ों और बच्चों
की चीखें विचलित नहीं करती हैं
अगर आप को युद्ध में बेवा हुई महिलाओं के
आंसुओं से कोई फर्क नहीं पड़ता है
अगर आपको रोटी, दूध और दवाओं के अभाव में
तड़पते, दम तोड़ते बच्चों को देखकर भी
इस युद्ध से घृणा पैदा नहीं होती
तब यकीन मानिए 
आप इंसान होने का दर्जा खो चुके हैं।

क्या आप इसलिए युद्ध का समर्थन करते हैं कि
फलां देश हमारा मित्र है
क्या आप इसलिए युद्ध का समर्थन करते हैं कि
फलां देश से हमारे व्यापारिक रिश्ते हैं
क्या आप इसलिए युद्ध का समर्थन करते हैं कि
फलां देश, हमारे विधर्मी लोगों का देश है
तब माफ कीजिए आपकी तुलना 
किसी मनुष्य तो क्या 
जानवर से भी नहीं हो सकती।

कुछ भलेमानुस भी हैं
जो अमन-चैन की अच्छी-अच्छी बातें करते हैं
वह सोचते हैं कि
युद्ध केवल सनकी तानाशाहों की करामात है
इसलिए तमाम मुल्कों पर बमों की बरसात है
लेकिन क्या ये इतनी जरा सी बात है
नहीं! जब तक पूंजी का राज है
दुनिया में साम्राज्यवाद है
तब तक जंग का खतरा बरकरार है
हर क्षण युद्ध के हालात हैं
अगर दुनिया में अमन-चैन लाना है
तो पूंजीवाद को मिटाना है, 
समाजवाद लाना है।।
        -भारत सिंह, आंवला

आलेख

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।