मजदूर नेताओं को गुंडा एक्ट में जिला बदर करने की साजिश
हरिद्वार/ हरिद्वार में मजदूरों के स्वतः स्फूर्त संघर्षों की बढ़ती के बीच जिला प्रशासन व पुलिस इन आंदोलनों को कुचलने पर उतारू है। इसी उद्देश्य से वह इन संघ
हरिद्वार/ हरिद्वार में मजदूरों के स्वतः स्फूर्त संघर्षों की बढ़ती के बीच जिला प्रशासन व पुलिस इन आंदोलनों को कुचलने पर उतारू है। इसी उद्देश्य से वह इन संघ
इंकलाबी मजदूर केन्द्र की बलिया इकाई के जुझारू कार्यकर्ता कामरेड अर्जुन प्रधान का गत 22 मई 2026 को देहान्त हो गया। गाजीपुर-बलिया की सीमा पर स्थित ग्राम कमसड़ी (बखरिय डीह) क
हालिया समय में होने वाले पेपर लीक श्रृंखला में NEET (UG) 2026 का नाम भी जुड़ गया है। 3 मई 2026 को यह परीक्षा आयोजित हुई। अभी-अभी सभी छात्र जिन्होंने NEET (UG) 2026 परीक्षा में भाग लिया था निश्चिंत ह
सुलेमान जब पहली बार इस फैक्टरी में आया तब महज 15 साल का था। पिता खरात मशीन कारीगर। स्वभाव से शुष्क और निर्दयी।। अक्सर छोटे-मोटे कामों के लिए कंपनी बुला लेती और काम के एवज
जैसा कि तय ही था कि जैसे ही पांच राज्यों में चुनाव निपटेंगे वैसे ही गैस, पेट्रोल-डीजल के दामों में आग लगेगी और महंगाई आसमान छूने लगेगी। मई माह के दूसरे पखवाड़े में पेट्रोल-डीजल सौ रुपये प्रति लीटर या उससे भी ज्यादा तक जा पहुंचे। बढ़ती महंगाई के बीच देश का आर्थिक संकट गहराता गया है और उसके साथ सामाजिक संकट भी गहरा रहा है। और इस गहराते सामाजिक संकट ने समाज के हर वर्ग और तबके को मजबूर कर दिया है कि वह अपनी प्रतिक्रिया दे।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।
भारत में दहेज प्रथा केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि हजारों महिलाओं की जान लेने वाली एक संगठित हिंसा बन चुकी है। हर वर्ष अनेक महिलाएं शादी के बाद मानसिक और शारीरिक प्रता
देश के बड़े हिस्से में मजदूर संघर्षों की लहर जारी है। उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण के दौर में ज्यादा तेजी बढ़ती हुई पूंजीपति वर्ग और मजदूर वर्ग की खाई की पृष्ठभूमि में मजदूरी
इस बार मजदूर आंदोलन की नई लहर और पुलिसिया दमन के साये के बीच जोश और गुस्से-आक्रोश के साथ मई दिवस मनाया गया। इस अवसर पर मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) द्वारा न्यूनतम वे
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार नोएडा में हुए मजदूर आंदोलनों से इतना घबरा गयी है कि वह अब मई दिवस की महान परंपरा को भी नहीं मनाने दे रही है। मई दिवस के शहीदों को याद करने से भ
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।