मेघालय : कोयला खदान में विस्फोट, 27 मजदूरों की मौत

Published
Mon, 02/16/2026 - 06:00
/meghalay-coal-mines-mein-blast-27-workers-ki-death

मेघालय में 5 फरवरी को एक कोयला खदान में विस्फोट होने से 27 मजदूरों की मौत हो गयी। अभी भी कई मजदूर 100 मीटर गहरे गड्डे में फंसे हैं। यह खदान पूर्वी जयंतिया हिल्स में थांगस्कू क्षेत्र में उम्संगट गांव में स्थित है। यह खान एक रैट होल खान है। मृतकों में आस-पास के स्थानीय श्रमिकों के अलावा असम, मेघालय और नेपाल के रहने वाले थे।
    
बताया जा रहा है कि यह खदान अवैध रूप से चल रही थी। इस वजह से इसमें कितने मजदूर काम कर रहे थे यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। खदान में आग लगने का कारण विस्फोट था जो डायनामाइट के कारण हुआ। डायनामाइट से विस्फोट करने वाले दो व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। संभवतः ये ही इस कोयला खदान के मालिक भी हैं।

मेघालय में इससे पहले भी कई कोयला खदान विस्फोट हो चुके हैं। 2018 में पूर्वी जयंतिया हिल्स में एक बाढ़ग्रस्त खदान में 15 श्रमिकों की मौत हो गयी। 2021 में एक अन्य घटना में 5 खदान श्रमिकों की मौत हो गयी।
     
मेघालय में एन जी टी द्वारा 2014 से ही रैट होल खनन पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर प्रतिबंध लगा रखा है। इसके बावजूद इस तरह खनन पर रोक लग ही नहीं पा रही है। दरअसल मेघालय में रोजगार के अवसर कम होने के चलते यहां खनन का काम रोजगार का प्रमुख साधन है। ऐसे में राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी थी कि वह रोजगार के साधन उपलब्ध करवाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। यही करण है कि पूर्वी जयंतिया हिल्स में अवैध खनन का काम बढ़ रहा है। और यह सामान्य बन गया है। जिससे कारण मजदूर अपनी जान गंवाते रहते हैं।

आलेख

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

/piketi-ka-global-justice-project-samraajyavad-ki-pairokari

जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।