विविध

लक्जर मजदूरों के आवाज उठाने पर प्रबंधन मजदूरों को निकालने पर उतारू

हरिद्वार/ सिडकुल (हरिद्वार) में लक्जर राइटिंग इंस्ट्रूमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड पेन निर्माता कम्पनी है। हरिद्वार सिडकुल में इसके दो प्लांट हैं जिसमें हजारो

अमरीका में लोकतंत्र का प्रहसन और धनतंत्र का खेल

अमरीकी ‘‘लोकतंत्र’’ की यही सबसे बड़ी सच्चाई है कि इस ‘‘लोकतंत्र’’ में हर चार साल बाद यह तय करना होता है कि अमरीकी एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग के किस गुट को शासन हेतु चुना जाए। इस ‘‘लोकतंत्र’’ में मजदूर-मेहनतकश आबादी के ऊपर कौन सा गुट शासन करेगा, इस चुनाव में भी हमेशा की तरह यही फैसला होगा। 

जमीन खाली कराने से पहले पुनर्वास का खाका तैयार करने का निर्देश

हल्द्वानी/ बनभूलपुरा में रेलवे द्वारा जमीन लिए जाने से पहले सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्वास की योजना तैयार करने का निर्देश दिया है। 24 जुलाई की सुनवाई में सुप्

हिन्दू फासीवादी और भारतीय अर्थव्यवस्था

किसी भी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की तरह भारतीय अर्थव्यवस्था भी अपने बुनियादी चरित्र में अराजक है। इसमें कौन कितना पैदा करेगा और कौन कितना उपभोग करेगा यह बाजार से तय होता है और बाजार में मांग और पूर्ति का राज होता है। कभी मांग पूर्ति से आगे निकलती है तो कभी पूर्ति मांग से। दोनों के बीच संतुलन यानी मांग और पूर्ति का बराबर होना यदा-कदा ही होता है। इस सबमें प्रतियोगिता निर्णायक होती है। कौन कितना बाजार हथिया लेता है, हर कोई इसी में लगा होता है। यहां तक कि मजदूर भी इस प्रतियोगिता में उतर पड़ते हैं- ज्यादा बेहतर मजदूरी और काम की शर्तों के लिए। 

साझे संघर्ष की ओर बढ़ती मजदूर यूनियनें

रुद्रपुर/ मजदूर नेताओं पर गुंडा एक्ट की कार्यवाही के विरोध में 7 जुलाई की मजदूर महापंचायत की जबरदस्त सफलता, सिडकुल (रुद्रपुर-पंतनगर) में मजदूरों की व्याप

15 अगस्त : आजादी के मायने तलाशने की जरूरत

भारत के पूंजीपति ही नहीं बल्कि विदेशी पूंजीपति भी मोदी जैसे हिन्दू फासीवादी के राज में खूब फूले-फले हैं। अम्बानी, अडाणी, टाटा, मित्तल जैसों की बढ़ती दौलत का स्वाभाविक परिणाम भारत के मजदूरों, किसानों के दरिद्रीकरण और कंगालीकरण के रूप में सामने आया है। एक ओर सम्पत्ति के अनन्य स्रोत पर बैठे अम्बानी-अडाणी हैं और दूसरी ओर गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई की मार झेलते करोड़ों मजदूर-किसान हैं।

विषधारी

वो चाहते हैं बांटना
हमारी रोटियों को हिंदू और मुसलमां में
चाहते हैं सींचना खून से युवा नस्लों को
ताकि काट सकें लहलहाती
वोटों की फसलों को।

जूठन

भारतीय समाज में वैसे तो अनाज को ईश्वर का दर्जा मिला हुआ है। अनाज को लेकर समाज में दो तरह के विचार मौजूद हैं, पहला यह कि अनाज को बर्बाद करना पाप है और दूसरा कि बचा हुआ अना

श्रम संहितायें लागू करने की तेज होती सरकारी कवायद

मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में मजदूर विरोधी 4 श्रम संहितायें लागू करने की कवायद तेज हो गयी है। इन संहिताओं को देश की संसद 2019 व 2020 में ही पारित कर चुकी है पर मजदूर व

विस्फोटक बेरोजगारी और बंशी बजाता नीरो

भारत में बेरोजगारी का आंकड़ा आजादी के बाद सर्वोच्च स्तर तक पहुंचा हुआ है। बेरोजगारी विस्फोटक रूप ले चुकी है इसका प्रमाण जब-तब देखने को मिलता रहता है। अभी हाल में गुजरात के

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।