बोर्ड आफ पीस : वर्चस्व का नया केन्द्र
अमेरिकी सरगना डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने नेतृत्व में एक नये संगठन का एलान किया है। इस संगठन का नाम ‘बोर्ड आफ पीस’ रखा गया है। गाजा शांति पहल के लिए पहले इस तरह के मंच की रूपर
अमेरिकी सरगना डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने नेतृत्व में एक नये संगठन का एलान किया है। इस संगठन का नाम ‘बोर्ड आफ पीस’ रखा गया है। गाजा शांति पहल के लिए पहले इस तरह के मंच की रूपर
नये वर्ष 2026 की शुरूआत के साथ अमेरिकी सरगना ट्रम्प ने नया चोला पहन लिया है। उसने ‘शांति दूत’ का अपना पुराना स्वघोषित चोला उतार कर क्रूर हत्यारे का रूप धर लिया है। वैसे त
ट्रम्प ने अपने राष्ट्रपति पद के चुनाव प्रचार के दौरान अमरीकी बड़ी तेल कम्पनियों से वायदा किया था कि वे वेनेजुएला के तेल भण्डार पर उनका नियंत्रण फिर से कायम कर देंगे। ट्रम्प के चुनाव प्रचार में इन बड़ी तेल कम्पनियों ने भारी धन चंदे के रूप में दिया था। वेनेजुएला में ह्यूगो चावेज ने इन कम्पनियों की नियंत्रणकारी स्थिति को समाप्त करके राज्य के मालिकाने की कम्पनी बना दी थी। अब ये तेल कम्पनियां राष्ट्रीयकरण किये जाने के बाद अपने नुकसान के हरजाने की मांग करेंगी। सबसे बढ़कर तो अब वेनेजुएला के तेल भण्डार पर इनका कब्जा होगा।
अमेरिकी बड़बोले राष्ट्रपति ट्रम्प एक बार फिर शीघ्र ही रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त कराने का दावा कर रहे हैं। हालांकि उनके बीते एक वर्ष में ऐसे अनगिनत दावों की विफलता ने साबित
अफ्रीकी महाद्वीप का जिक्र भयावह गरीबी और आपसी युद्धों में उलझे रहने के बतौर है। अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी पीठ इस बात पर थपथपाते हैं कि उन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप के देशों के बीच चलने वाले युद्धों को रुकवाया। लेकिन ये युद्ध और झड़पें अभी भी जारी हैं। अमरीकी और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच इस क्षेत्र की खनिज सम्पदा और साधन स्रोतों के लिए संघर्ष चल रहे हैं। ये दिनों-दिन तीव्र होते जा रहे हैं।
बीसवीं सदी ने दो विनाशकारी विश्व युद्धों को देखा था। अब हम इक्कीसवीं सदी में रह रहे हैं। 21वीं सदी का भी एक चौथाई अब खत्म होने को है। अक्सर ही बातें होती हैं कि तीसरा विश
ऐसी स्थिति में जहां अमरीकी साम्राज्यवादियों का अपने सहयोगी यूरोपीय साम्राज्यवादियों के साथ मतभेद व टकराव बढ़ रहे हों, अमरीका और रूस के बीच, अमरीका और चीन के बीच तथा चीन और भारत के बीच तरह-तरह के विवाद और टकराव बढ़ते जा रहे हों, वहां जी-20 की एक सकारात्मक मंच के बतौर न तो अब साम्राज्यवादियों के लिए कोई खास उपयोगिता रह गयी है और न ही दूसरे साम्राज्यवादी देशों- चीन और रूस- के लिए इसकी प्रभावशाली भूमिका बनने की संभावना है।
इजरायल की हत्यारी हुकूमत युद्ध विराम के बाद गाजा पट्टी में ‘स्क्विड गेम’ टी वी वेब सीरीज सरीखा खेल खेलकर निर्दोष फिलिस्तीनियों का कत्लेआम मचा रही है। युद्ध विराम के बाद इ
पूंजीवादी शासकों से लेकर आम जन तक दुनिया में आज हर कोई पर्यावरण को हो रहे नुकसान के खतरों को जानता है। हर कोई जानता है कि पर्यावरण सुरक्षा एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना हुआ है
अफ्रीका के देश सूडान में बड़े पैमाने पर नरसंहार जारी है। यह लम्बे समय से चल रहा है। एक तरफ सूडान की केन्द्रीय सरकार की सेना है। यह केन्द्रीय सरकार अल बुरहान नामक जनरल के न
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।
जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है।
अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।