पीली रेखा और फिलिस्तीनी अवाम

/yellow-line-and-philistin-people

इजरायल की हत्यारी हुकूमत युद्ध विराम के बाद गाजा पट्टी में ‘स्क्विड गेम’ टी वी वेब सीरीज सरीखा खेल खेलकर निर्दोष फिलिस्तीनियों का कत्लेआम मचा रही है। युद्ध विराम के बाद इजरायल ने गाजा पट्टी के 60 प्रतिशत से अधिक हिस्से को अपने कब्जे में लेकर एक पीली रेखा खींच दी है। इस पीली रेखा को पार करते ही किसी फिलिस्तीनी को इजरायली सैनिक गोलियों से भून सकते हैं। 
    
अभी युद्ध विराम का पहला चरण चल रहा है। पहले चरण ने दिखाया कि युद्ध विराम केवल नाम का है। हर रोज इजरायली सैनिक कत्लेआम मचा रहे हैं। पीली रेखा के पार जाने की फिलिस्तीनी लोगों को इजाजत नहीं है। ढेरों लोग पीली रेखा के पार अपना तबाह घर देखते हुए मार डाले गये। इस तरह फिलिस्तीनी लोगों को इस पीली रेखा और समुद्र के बीच छोटे से क्षेत्र में कैद कर लिया गया है। 
    
इजरायली सत्ता इस पीली रेखा को ही औपचारिक सीमा बनाने पर उतारू है। हालांकि सीमा पर चर्चा दूसरे चरणों की वार्ता में होनी है पर नेतन्याहू हुकूमत इसी पीली रेखा को स्थायी बनाने पर उतारू है। 
    
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा दिये गये प्रस्ताव के तहत पीली रेखा के पार इजरायली कब्जे वाले इलाके में पुनर्निर्माण, निवेश व बुनियादी ढांचा बनाया जायेगा। पर पीली रेखा के भीतर तब तक कोई पुनर्निर्माण नहीं होगा जब तक हमास को निरस्त्र नहीं कर दिया जाता। यानी जहां फिलिस्तीनी अवाम कैद है वहां कोई पुनर्निर्माण नहीं होगा और जो इलाका खाली व इजरायली सेना के कब्जे में है वहां पुनर्निर्माण होगा। 
    
पीली रेखा को चिन्हित करने के लिए ऊंचे पीले रंग के कंक्रीट के ब्लाक बनाये गये हैं। हालांकि कभी भी ब्लाक को आगे पीछे भी किया जा रहा है। ऐसे में जानकारी भी सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रही है और ढेरों दफा अनभिज्ञता की वजह से लोग पीली रेखा पार कर जान गंवा दे रहे हैं। कई दफा मासूम बच्चे खेल में पीली रेखा पार कर जान गंवा दे रहे हैं। 
    
इस पीली रेखा के भीतर कैद आबादी पूरी तरह से राहत सप्लाई पर जीने को मजबूर है। उसके घर तबाह हो चुके हैं। इस राहत सप्लाई पर भी इजरायली सेना का नियंत्रण है। ऐसे में कभी एक वक्त तो कभी दो वक्त खाना खाकर फिलिस्तीनी जनता संघर्ष कर रही है। 
    
एक पूरी कौम को उसके देश से खदेड़ने की अमेरिकी-इजरायली हत्यारों की चाहत को यह बहादुर फिलिस्तीनी भूखे-बेघर होना झेल कर भी नाकाम करने में सफल हुए हैं। उन्होंने भारी कुर्बानियां दीं पर संघर्ष का जज्बा कायम रखा। आज भी पीली रेखा की कैद में रहकर एक वक्त खाना खाकर भी वे आजाद फिलिस्तीन का सपना जिन्दा रखे हुए हैं। बंदूकों से भले ही अमेरिकी-इजरायली हत्यारे जीतते नजर आ रहे हों पर हौंसलों के मामले में वे कभी भी फिलिस्तीनी जनता को नहीं हरा सकते।  

आलेख

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

/piketi-ka-global-justice-project-samraajyavad-ki-pairokari

जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।