खतरे में अरावली पर्वत श्रंखला

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हिमालय से कहीं अधिक पुरानी माने जाने वाली अरावली पर्वत श्रंखला आज खतरे में है। लगभग 2 अरब वर्ष पुरानी 700 किमी. लम्बी यह पर्वत श्रंखला गुजरात, राजस्थान, हरियाणा व दिल्ली तक फैली है। आज सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय ने इस पर्वत श्रंखला के लिए खतरा पैदा कर दिया है। 
    
दरअसल भारत सरकार की अरावली पर्वतमाला हेतु एक समान परिभाषा की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने 100 मीटर या अधिक ऊंचाई के पर्वतों को अरावली का हिस्सा माना है। इस परिभाषा के आधार पर 90 प्रतिशत पहाड़ियां अरावली का हिस्सा होने से वंचित हो गयी हैं और संरक्षित अरावली के तहत संरक्षण से वंचित कर दी गयी हैं। 
    
अरावली के तहत 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1048 पहाड़ियां ही 100 मीटर से ऊंची हैं। इस तरह लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियां संरक्षण से वंचित हो गयी हैं। 
    
अरावली भारत की एकमात्र आड़ी पर्वतमाला है। भारत की अधिकांश पर्वत श्रंखलायें मानसून के अनुकूल उत्तर-पूर्व दिशा में फैली है जबकि अरावली दक्षिण-पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर खड़ी है। सीना ताने खड़ी अरावली राजस्थान की रेत भरी आंधियों को सोख लेती रही है और दिल्ली व अन्य स्थानों को इस भारी धूल से बचाती रही है। कुछ लोग इसे भारत की रीढ़ की भी संज्ञा देते रहे हैं। 
    
अरावली में खनन आजाद भारत के बाद से ही शुरू हो चुका था। 90 के दशक की शुरूआत में मुख्य न्यायाधीश वेंकटचलैय्या के निर्देश पर दिल्ली को रेतभरी आंधियों से बचाने के लिए अरावली को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया। 7 मई 1992 को भारत सरकार के पर्यावरण व वन मंत्रालय ने अरावली संरक्षण की अधिसूचना जारी की। 
    
अरावली का महत्व केवल धूलभरी आंधी रोकने तक ही नहीं है। यह भूजल संरक्षण का बड़ा स्रोत है। बारिश का पानी इसके छिद्रों से तलहटी में चला जाता रहा है। इसी के चलते इन राज्यों में जहां पहाड़ियां हैं वहां मीठा भूजल उपलब्ध है व शेष जगह खारा पानी मिलता है। इसके साथ ही ये पहाड़ियां तापमान के चरम उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करती हैं। 
    
अरावली में जब खनन शुरू हुआ तो राजस्थान में कई जगहों पर पानी का अभाव हो गया। बाद में खनन पर रोक के बाद कई गांवों में कुंओं में पानी लौट आया। खनन रुकवाने के लिए अरावली के इर्द-गिर्द के लोगों ने सालों संघर्ष चलाया था। 
    
अब अरावली के दोहन पर खनन माफियाओं व पूंजीपतियों की गिद्ध निगाहें टिकी हैं। वे अरावली के खनिजों के दम पर अपना मुनाफा बढ़ाना चाहते हैं। मोदी सरकार उनकी इस चाहत को आसान करने का काम कर रही है। सरकार प्रकृति से एक ऐसी छेड़छाड़ की मंजूरी दे रही है जिसका असर मौसम चक्र अनियमित होने, बाढ़ सूखा बढ़ने, पेयजल गायब होने व दिल्ली के धूलभरी आंधियों का शिकार होने के रूप में सामने आयेगा। 
    
पर्यावरणवादी जहां पर्यावरण संरक्षण की बातें करते हुए प्रकृति से हर किस्म की छेड़छाड़ का विरोध करते हैं। वे समस्त मानव जाति को पर्यावरण प्रदूषण का दोषी मान आत्मसुधार की वकालत करते हैं। वे यह नहीं देखते कि आम पहाड़ी जन द्वारा लकड़ी बीनना व खनन माफियाओं द्वारा पर्यावरणीय नुकसान समान नहीं है। पूंजीवादी व्यवस्था के रहते पर्यावरण सुरक्षित नहीं हो सकता, वे यह नहीं समझ पाते और इसीलिए संघर्ष के निशाने पर पूंजीपतियों को लेने के बजाय बाज दफा उन्हीं पूंजीपतियों के अनुदानों पर पलते हैं जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते जा रहे हैं। 
    
साथ ही पर्यावरणवादी ये भी नहीं देख पाते कि मनुष्य अपनी पैदायश से प्रकृति को बदलने वाला जीव रहा है। इसी के जरिये उसने अपना आज तक का विकास किया है और मनुष्य को दोबारा जंगलों में नहीं भेजा जा सकता। हां, मानवीय खनन-बड़े बांध आदि गतिविधियों के वक्त पर्यावरणीय नुकसान का अनुमान व उसकी क्षतिपूर्ति के उपाय कर ही पर्यावरण संरक्षित रखने वाला विकास किया जा सकता है।
    
पूंजीवादी व्यवस्था में चूंकि मुनाफा ही प्रकृति के दोहन का एकमात्र प्रेरक होता है इसीलिए पूंजी प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर पर्यावरण को चौपट करती है। इस मुनाफे के लिए वह कानूनी बाधाओं को भी मानने से इंकार कर देती है। 
    
ऐसे में मजदूर वर्ग की समाजवादी व्यवस्था में ही पर्यावरण का ध्यान रखते हुए संतुलित विकास संभव है।
    
आज जब अरावली पर हमले से बड़ा पर्यावरणीय खतरा पैदा हो चुका है तो अरावली बचाने की लड़ाई किसी पर्यावरणवादी-मानवतावादी धरातल से लड़ने के बजाय पूंजीवाद विरोधी तेवरों से ही लड़ी और जीती जा सकती है। पर्यावरण चौपट करते पूंजीपति व उनके लिए काम करती सरकारों को निशाने पर लेना जरूरी है।  

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