गाज़ा नरसंहार के दो साल; कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन आयोजित

/gaza-narasanhar-ke-do-saal-kai-jagahon-par-virodh-pradarshan-ayojit

इजराइल द्वारा गाजा में किये गये नरसंहार के दो साल पूरे हो चुके हैं। इस दौरान गाजा पट्टी में आधिकारिक तौर पर ही 70 हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं; हालांकि मरने वालों की वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है। ऐसे में युद्ध अपराधी और हत्यारे नेतन्याहू की गिरफ्तारी और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राष्ट्र-राज्य के गठन की मांग के साथ 12 अक्टूबर को कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन, सभा-ज्ञापन एवं पुतला दहन जैसी कार्यवाहियां की गईं।  
    
मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) द्वारा दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस दौरान हुई सभा में वक्ताओं ने फिलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित की और अमेरिकी साम्राज्यवाद व पश्चिम एशिया में उसके लठैत इजराइल की भर्त्सना की। इस दौरान राष्ट्रपति को एक ज्ञापन प्रेषित कर भारत सरकार से मांग की गई कि वह इजराइल के साथ अपने सभी संबंध ख़त्म करे। 
    
विरोध प्रदर्शन में मासा के घटक संगठनों -इंकलाबी मजदूर केंद्र, इफ्टू (सर्वहारा), सी एस टी यू, जन संघर्ष मंच हरियाणा, मजदूर संघर्ष संगठन एवं ग्रामीण मजदूर यूनियन के अलावा बी एन ए एस यू, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, इफ्टू (न्यू), क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन एवंdelhi कलेक्टिव से जुड़े लोगों व कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं इत्यादि ने भागीदारी की।
    
हरिद्वार में अमेरिकी साम्राज्यवाद और जियनवादी इजराइली शासकों का पुतला फूंका गया। इस दौरान हुई सभा में वक्ताओं ने कहा कि इजराइल द्वारा हमास को खत्म करने के नाम पर गाजा के आम लोगों, महिलाओं और बच्चों का भारी कत्लेआम किया गया है; वहां के ज्यादातर स्कूलों-अस्पतालों तक को बमबारी कर नष्ट कर दिया गया है। गाजा में आज भूख के कारण और इलाज के अभाव में भी लोग मर रहे हैं। 
    
इंकलाबी मजदूर केंद्र के आह्वान पर हुये इस विरोध प्रदर्शन में प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, प्रगतिशील भोजनमाता संगठन, भेल मजदूर ट्रेड यूनियन, सीमेंस वर्कर्स यूनियन एवं देवभूमि श्रमिक संगठन इत्यादि के कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की।
    
काशीपुर में क्षत्री चौराहे पर नेतन्याहू का पुतला दहन किया गया। इस दौरान हुई सभा में वक्ताओं ने कहा कि अमेरिका से लेकर यूरोप और अरब व एशिया के देशों, सभी जगहों पर जनता गाजा नरसंहार के विरोध में सड़कों पर उतर रही है। इस जन दबाव में यूरोप के देशों को भी फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता देने को बाध्य होना पड़ा है। पूरी दुनिया में अलगाव में पड़े अमेरिका व इजराइल का फिलहाल हमास के साथ युद्ध विराम समझौता हुआ है। लेकिन इजराइल ऐसे दो समझौते पहले भी तोड़ चुका है। 
    
इंकलाबी मजदूर केंद्र के आह्वान पर हुये इस विरोध प्रदर्शन में क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन एवं प्रगतिशील महिला एकता केंद्र से जुड़े लोगों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की।
    
रामनगर में स्पोर्ट्स क्लब में ‘‘साम्राज्यवाद, युद्ध और गाजा नरसंहार’’ पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन कर नेतन्याहू का पुतला दहन किया गया। विचार गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि अमेरिकी साम्राज्यवादी अपने घटते प्रभुत्व के कारण बौखलाये हुये हैं और पूरी दुनिया में युद्ध का प्रसार कर रहे हैं। पिछले ढाई साल से रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध भी असल में रूसी और अमेरिकी साम्राज्यवादियों के बीच जारी युद्ध है और यूक्रेन इसमें एक मोहरा भर है। अमेरिकी साम्राज्यवादी हमारे समय में मानवता के सबसे बड़े दुश्मन हैं और दुनिया में युद्धों के अंत के लिये साम्राज्यवाद का अंत जरूरी है। 
    
इंकलाबी मजदूर केंद्र के आह्वान पर हुये इस कार्यक्रम में उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी, प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, परिवर्तनकामी छात्र संगठन, प्रगतिशील भोजनमाता संगठन एवं प्रगतिशील जन एकता मंच के कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की।
    
रुद्रपुर में गांधी पार्क में सभा के उपरांत अमेरिकी साम्राज्यवाद एवं जियनवादी इजराइली शासकों का पुतला दहन किया गया। सभा में वक्ताओं ने कहा कि इजराइल ने गाजा में मानवीय सहायता रोकने के लिये नाकाबंदी कर दी और संचार माध्यमों पर प्रतिबंध लगा दिया; बच्चों-बूढ़ों समेत लाखों फिलिस्तीनियों को भुखमरी की अवस्था में अपने ही देश में कैदी बना दिया। यह सब एक नस्लवादी, जियनवादी और साम्राज्यवादी परियोजना के तहत किया गया। 
    
कार्यक्रम में इंकलाबी मजदूर केंद्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, सेंटर फार स्ट्रगलिंग ट्रेड यूनियंस (सी एस टी यू), मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा), वेलराइज यूनियन, ऐरा श्रमिक संगठन, इंटरार्क मजदूर संगठन, आटोलाइन इम्प्लाइज यूनियन, करोलिया लाइटिंग यूनियन एवं डलफिन मजदूर संगठन के कार्यकर्ताओं ने भागीदारी की।             -विशेष संवाददाता
 

आलेख

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

/war-anay-sadhanon-se-politics-ka-hi-jaari-roop-hai

अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

/piketi-ka-global-justice-project-samraajyavad-ki-pairokari

जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।