‘‘मेरे साथ के लोग मुझे पहचानते हैं’’

    यह कविता मैंने लगभग चार वर्ष पूर्व लिखी थी। अक्सर हम जैसे लोग जो समाज में बुनियादी तब्दीली करना चाहते हैं, वे अपने नेताओं को, शिक्षकों को, सिद्धान्तकारों को या रणनीतिकारों, मार्गदर्शकों को अपना आदर्श मानते हैं और उन्हीं की तरह एक नये समाज के निर्माण में योगदान करना चाहते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि जो लोग (संगठन के साथी) उपरोक्त सभी आदर्शों को हम तक पहुंचाते हैं उनकी मेहनत को हम कहीं न कहीं दरकिनार कर देते हैं। 
    

उन तमाम कामरेडों को समर्पित मेरे द्वारा रचित एक कविता जो जी जान से नये समाज निर्माण में अपनी भूमिका तय किये हुए हैं-

मेरे साथ के लोग मुझे जानते हैं, मेरे साथ के लोग मुझे पहचानते हैं
मेरे साथ के लोग मुझे जानते हैं, मेरे साथ के लोग मेरे अस्तित्व को पहचानते हैं
मेरे साथ के लोग मुझे टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं बल्कि पूरा का पूरा जानते हैं
मेरे साथ के लोग मेरी देखभाल करते हैं, मेरा ख्याल रखते हैं, मेरी परवरिश करते हैं 
एक छोटे पौधे की भांति
मेरे साथ के लोग मेरा ख्याल केवल इसलिए नहीं रखते हैं कि वो पौधा घर के आस-पास की क्यारियों में या घरों के ऊपर रखे हुए रंग-बिरंगे गमले की शोभा बढ़ाये
मेरे साथ के लोग मेरा ख्याल केवल और केवल इसलिए रखते हैं कि जब वो बड़ा हो 
एक विशाल वृक्ष की तरह, जो हर किसी को उसके हिस्से की छांव दे सके।
मेरे साथ के लोग मुझे जानते हैं, मेरे साथ के लोग मेरे अस्तित्व को पहचानते हैं 
    -पंकज कुमार, किच्छा
 

आलेख

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।