एक जरूरी उपन्यास ‘मातीगारी’

Published
Sat, 08/01/2026 - 15:50
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वर्गीय समाज का कोई भी शासक इतना कायर, डरपोक, हताश-निराश और मूर्ख होेता है। वह समाज से इतना डरता है कि बिना सोचे-समझे सिर्फ एक ही काम कर सकता है कि वह जिससे डरता है उसे गिरफ्तार कर जेल में डाल कर सालोें-साल बाहर नहीं आने देता है। ऐसा ही काम नाईजीरिया के शासक जो कि एक उपन्यास के काल्पनिक पात्र से इतना घबड़ा जाता है कि वह उसे गिरफ्तार करने का आदेश दे देता है, लेकिन जब देश भर की पुलिस उसे खोजती है तो पता चलता है कि वह कोई जीवित इंसान नहीं बल्कि एक उपन्यास का काल्पनिक पात्र है। 
    
यह कहानी अफ्रीकी देश नाईजीरिया के लेखक न्गुगी वा थ्योंगो द्वारा लिखे गये उपन्यास ‘मातीगारी’ की है। इस उपन्यास के नायक का नाम भी मातीगारी है। कहानी उस दौर की है जब नाईजीरिया एक औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत था। वहां पर जर्मनी, अमेरिकी, फ्रांस तथा अन्य देशों के साम्राज्यवादी लुटेरे इस देश की प्राकृतिक सम्पदा को लूट कर अपने देशों में ले जाते थे और इस देश की जनता हमेशा भुखमरी, अकाल, अशिक्षा और अकाल मृत्यु से जूझती रहती थी। यह देश प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर होने के बाद भी हमेशा एक गरीब और लाचार देश बना रहा। 
    
इस औपनिवेशिक शासन के खिलाफ वहां के लोग सशस्त्र विद्रोह कर देते हैं, लोग जंगलोें में छिपकर गुरिल्ला लड़ाई लड़ते हंै, वे संगठित होते हैं और जंगलों में छिपकर औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ एक सशस्त्र संघर्ष का एलान कर देते हैं। औपनिवेशिक लुटेरों अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी आदि देशों की साम्राज्यवादी लुटेरी ताकतें होती हैं जो कि नाईजीरिया पर अपना अधिकार जमाये हुए हैं, वहां के प्राकृतिक संसाधनों को लूट रही होती हैं, और वहां के निवासियों को गुलामी में जीने के लिए मजबूर कर रही होती हैं। इस गुलामी के खिलाफ नाईजीरिया की जनता एकजुट होकर सशस्त्र विद्रोह संगठित करती है और जंगलों में छिपकर गुरिल्ला युद्ध शुरू करती है। कई सालों तक यह युद्ध चलता है। इसमंे कई लोग अपनी शहादत देते हैं। 
    
इस सशस्त्र संघर्ष से घबड़ा कर अंततः विदेशी उपनिवेशवादी नाईजीरिया की सत्ता देशी पूंजीपतियों के ऊपरी तबके या कहें देशी शोषक वर्ग को सौंप देते हैं। वे सत्ता देशी काले लोगों के हाथों में दे तो देते हैं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से उस सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूती से बनाये रखते हैं, वहां के प्राकृतिक संसाधनों पर लूट का तंत्र मजबूती से अपने हित के लिए बनाये रखते हैं, दिखाने के लिए वह काले लोगों को शासक भी घोषित कर देते हैं ताकि आम जनता को ये भ्रम हो कि अब वे विदेशी गुलामी से मुक्त हो गये हैं। 
    
जनता को इस बात की खुशी होती है कि अब हमारा अपना देश और हमारा राज होगा। हमारे द्वारा किया गया संघर्ष अब फलीभूत होगा, अब इस देश में कोई भी भूखा, गरीब, अशिक्षित नहीं रहेगा, किसी भी तरह से लाचार नहीं होगा, सारी जनता सुखी जीवन जी सकेगी, सभी को रोटी-कपड़ा-मकान, जो कि जीवन की मूलभूत जरूरत है और जो अभी तक औपनिवेशिक लुटेरों ने आम जनता तक नहीं पहुंचने दी, अब हमारे देश के शासक हमें मुहैय्या करायेंगे। जिन विदेशी लुटेरों ने इस देश की जनता को गरीबी, अशिक्षा, भुखमरी के जाल में फंसाये रखा, उस सब से अब हमें मुक्ति मिल जायेगी। अब सारी जनता सुख चैन से जीवन जी पायेगी और यहां की जनता का जीवन खुशहाल हो जायेगा। 
    
यही बात जब इस उपन्यास के नायक मातीगारी को पता चलती है कि अब हमारा देश विदेशी गुलामी से आजाद हो गया है, अब हमारे देश में अपनों का शासन हो गया है, अब हमारा देश खुशहाल होगा और इस देश का हर नागरिक अब मानवीय गरिमा के साथ जीवन जियेगा तो उसे संतोष और खुशी होती है और मातीगारी अपने हथियार बंद संघर्ष को सफल होता देखता है, तो वह सोचता है कि अब जब देश हमारे अपनों के हाथ में है तो हमें हथियारों की क्या जरूरत है। वह सोचता है कि अब अपने हथियारों को त्याग दिया जाये और शांति की पेटी कमर में बांध कर अपने घर जाया जाये। 
    
वह अपने हथियारों को जंगल में एक बड़े से पेड़ की जड़ में जमीन के अंदर छुपा कर रख देता है और शांति की पेटी कमर में बांध कर, बहुत उल्लास और संतोष के साथ अपने घर को चल पड़ता है। जब वह जंगलों, पहाड़ों, नदी-नालों को पार करता हुआ कई दिन बाद अपने गांव की सीमा पर पहुंचता है तो उसे बहुत खुशी होती है कि वह अपने घर जायेगा तो अपने बच्चों, अपनी पत्नी और अपने माता-पिता और दोस्तों से मिलेगा और आजादी का जश्न मनायेगा। 
    
लेकिन जैसे ही वह अपने गांव की सीमा पर पहुंचता है तो देखता है कि कई सारे बच्चे एक कूड़े के ढेर से खाने की चीजें (मीट की चूसी हुई हड्डियां, बिस्किट के टुकड़े आदि) बीन रहे हैं और इन्हें पाने के लिए एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। यह देख कर उसे बड़ा आश्चर्य होता है। वह उन बच्चों के पास जाता है, उसका इरादा तो बच्चों से कूड़े में खाना बीनने की वजह जानने की थी मगर वे बच्चे उसे भी इसी कूड़े से खाना बीनने वाला समझ कर पत्थरों से मारने लगते हैं और कहते हैं ‘यह हमारा इलाका है, यहां खाना बीनने का तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है’ और उसे अपने पास आने से पहले भगाना चाहते हैं। यह देखकर उसे बहुत अफसोस होता है कि क्या यही वह आजादी है जो कि हमने आज हासिल की है, जिसके लिए हमारे हजारों हजार लोगोें ने कुर्बानी दी, जंगलों मंे भूखे-प्यासे रह कर संघर्ष किया। ऐसी आजादी की तो हमने कल्पना ही नहीं की थी। उसे इस प्रकार मिली आजादी पर क्षोभ और दुख होने लगता है। इसके बाद मातीगारी रास्ते भर बहुुत सारी घटनाओं को देखता है, जो उसकी कल्पना की आजादी में कहीं भी ठीक नहीं बैठती हैं। एक जगह वह देखता है कि दो पुलिस वाले एक औरत को परेशान कर रहे होते हैं, मातीगारी उन पुलिस वालों के पास जाकर पूछता है कि वे उस औरत को क्यों परेशान कर रहे हैं तो पुलिसवाले उसे धक्का देते हैं और उसके साथ मारपीट करने लगते हैं। तब मातीगारी उनकी खूब पिटाई लगाकर उस औरत को उनके चंगुल से छुड़ा लेता है और उसे अपने साथ ले जाता है। 
    
इस प्रकार मातीगारी दुखी तो होता है लेकिन उसे इस बात का संतोष होता है कि अब वह अपने घर जा रहा है, वह अपने घर की ओर चल पड़ता है। वह सोचता है घर जाकर वह अपने बच्चों और अपनी पत्नी से मिलेगा, अपने खेतांे को जोतेगा और उन खेतों में नई-नई फसलें उगायेगा, अपने पशुओं को चारा खिलायेगा, और अपने घर को ठीक-ठाक कर नया जीवन शुरू करेगा। 
    
लेकिन जब वह अपने घर के गेट पर पहुंचता है तो देखता है कि उसके घर के गेट पर दो गार्ड खड़े हैं। मातीगारी अपने घर में प्रवेश करने का प्रयास करता है तो वे गार्ड उसे रोक देते हैं उसे घर के भीतर जाने से मना करते हैं और कहते हैं कि अब यह घर उसका नहीं है। वे गार्ड उसे बताते हैं कि अब यह घर एक काले का है और मातीगारी के साथ मारपीट करते हैं, उसे वहां से भगा देते हैं।  
    
इन सारी घटनाओं से मातीगारी की समझ में आने लगता है कि हमें जो आजादी मिली है वह वास्तव में वैसी आजादी नहीं है जिसके लिए हमने हथियारबंद संघर्ष किया था। यह आजादी तो पुरानी गुलामी जितनी भयावह है। पहले गोरी चमड़ी वाले हमारा खून चूसते थे लेकिन अब तो काली चमड़ी वाले भी इसमें शामिल हो चुके हैं। अगर कुछ बदला है तो यह आजादी कुछ पैसे वाले काली चमड़ी के लोगों को हासिल हो गयी है शेष जनता तो पुरानी हालत में है। 
    
इन सारी घटनाओं से दुखी होकर मातीगारी अपने मन में सोचता है कि एक बार फिर हथियार उठाने की जरूरत है। यह सोचकर वह वापस जंगल की तरफ चल पड़ता है और उसी बड़े से पेड़ के नीचे, जहां उसने अपने हथियार छुपाऐ थे और शांति की बेल्ट पहनी थी, खोदता है और अपने हथियार निकाल कर फिर से हथियारबंद संघर्ष की तैयारी में जुट जाता है। 

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