स्मार्ट सिटी -अनवर हुसैन

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ये जगह जो अभी
योजनाओं और नीतियों में
ले रही आकार
जिस पर झूम रही सरकार
घात लगाए हैं विश्व-व्यापी व्यापार
और तुम हो कितने गंवार
तुम जैसों के कारण ही
नहीं हो पा रही स्मार्ट-सिटी साकार
सोच रहे योजनाकार
कैसे हो उनका स्वप्न साकार
एक ऐसा शहर
जहां नहीं हो पंक्ति का आखिरी आदमी
वही तो गंधाता है और गंदगी फैलाता है
किचिर-किचिर करता है
पचर-पिच्च थूकता है
जहां-तहां हगता मूतता है
कचरे के ढेर में कुकुरमुत्ते-सी
झोंपड़ी में सोता है जहां आए दिन
पैदा होते अवांछित बच्चे
क्या इन सबके बीच बन सकता है
स्मार्ट-सिटी का जादुई स्वरूप...
स्मार्ट-सिटी के लिए
स्मार्ट नागरिकों की होगी भरती
जिनके पास हों रंग-बिरंगे स्मार्ट-कार्ड,
कई शहरों में मकान, फार्म-हाउस
ऊंचा ओहदा, उच्च कुल का धनपति गोत्र
लंबी गाड़ियां, सजीले ड्राइवर, कड़क रक्षक
स्मार्ट बीवियां, स्मार्ट बच्चे, स्मार्ट सेक्रेटरी
जो नहीं होता पात्र
उसे नहीं होगा स्मार्ट-सिटी में प्रवेश का अधिकार
स्व-चालित सेंसर पकड़ डालेंगे
यदि किसी ने जबरन घुसने का किया प्रयास
ऐसे नामुराद गंवार
होंगे सजा के भागीदार....

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।