साम्राज्यवाद

अंतर्राष्ट्रीय नियम-कानून, व्यवस्था और अव्यवस्था

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देशों के बीच संबंधों में भी अंततः ताकत ही निर्णायक होती है। आर्थिक और सामरिक दोनों मिलकर यह तय करते हैं। तात्कालिक तौर पर सामरिक ताकत के महत्वपूर्ण होते हुए भी अंततः आर्थिक ताकत ज्यादा महत्वपूर्ण साबित होती है। 

अमरीका-ईरान समझौता वार्ता असफल- आगे क्या?

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लेकिन इसके बावजूद, अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी रणनीतिक पराजय स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। यदि इसे वह स्वीकार कर लें तो उसकी धौंसपट्टी, हमले, हुकूमत परिवर्तन की सारी कोशिशों पर पलीता लग सकता है? वैसे भी दुनिया भर में उसकी साख गिर रही है और प्रभाव भी कमजोर होता जा रहा है। 

लेबनान में गाजा जैसा जातीय सफाया -अशोक स्वैन

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जब दुनिया की नजरें डर और अविश्वास के साथ डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के खतरनाक टकराव पर टिकी थीं, लेबनान में हो रही तबाही दुनिया के ध्यान से दूर रही। इजराइल अपने उत्तरी पड़ोसी क

होरमुज की अमेरिकी घेराबंदी व बढ़ता तनाव

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पाकिस्तान में अमेरिका-ईरान के बीच पहले चक्र की वार्ता के विफल हो जाने के बाद अमेरिका ने होरमुज पर अपनी घेरेबंदी की घोषणा कर दी। इस घेरेबंदी के लागू होने से अमेरिका ने होर

सभ्यताएं न एक रात में पैदा होती हैं और न एक रात में मरती हैं

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ईरान पर अमेरिकी इजरायली हमलों के खिलाफ दुनिया भर में तीखे हो रहे मजदूर मेहनतकश जनता के आक्रोश के बीच ईरान और अमेरिका दो सप्ताह के युद्ध विराम पर सहमत हुए हैं। अमेरिकी साम

इजरायल-अमेरिका और धर्मयुद्ध

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पूंजीवादी सोच की यह समस्या है कि वह अपने विश्लेषण में स्वयं पूंजीपति व्यवस्था के मूलभूत चरित्र को कभी संज्ञान में नहीं लेती। वह कभी स्वीकार नहीं करती कि यह अन्याय-अत्याचार और शोषण वाली वर्गीय व्यवस्था है जो पूंजीपति वर्ग के हित में उसके हिसाब से चलती है। कि छिपी या खुली हिंसा इसका अनिवार्य तत्व है।

ट्रम्प-नेतन्याहू को ईरान ने कैसे सबक सिखाया

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अमेरिकी-इजरायली शासकों द्वारा 28 फरवरी को जब ईरान पर हमले बोलना शुरू किया गया तो हमलावरों के साथ-साथ दुनिया में किसी को भी अंदाजा नहीं था कि यह जंग एक माह से अधिक समय बीत

बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी है!

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सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

अमरीका-इजरायल का ईरान के विरुद्ध युद्ध

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अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

बौखलाये राष्ट्रपति ट्रम्प के स्टेट आफ यूनियन भाषण का सार

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ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।