अंतर्राष्ट्रीय नियम-कानून, व्यवस्था और अव्यवस्था

Published
Thu, 04/16/2026 - 15:50
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ईरान पर अमरीकी हमले के बाद से अंतर्राष्ट्रीय नियम-कानून की काफी चर्चा है। भांति-भांति के विशेषज्ञ बता रहे हैं कि यह हमला अंतर्राष्ट्रीय नियम-कानूनों का उल्लघंन है। कि यह हमला गैर-कानूनी है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की कोई अनुमति नहीं है। इत्यादि, इत्यादि।
    
इसी के साथ यह भी कहा जा रहा है कि इस हमले के साथ 1945 यानी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कायम हुई विश्व व्यवस्था खतरे में पड़ गयी है। कि इस विश्व व्यवस्था को खतरे में डालने का काम वही देश कर रहा है जिसने इसे कायम करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी यानी संयुक्त राज्य अमेरिका। कुछ लोग इस विडंबना की ओर भी ईशारा कर रहे हैं कि आज चीन नियम-कानून आधारित विश्व व्यवस्था का सबसे बड़ा प्रस्तोता बन कर उभरा है, वह चीन जिसे पश्चिमी देश कानून-व्यवस्था का पाठ पढ़ाया करते थे और जिसके बारे में कहते थे कि वहां किसी नियम-कानून का पालन नहीं होता। अभी हाल तक पश्चिमी कलम-घसीट यह कहा करते थे कि चीन वैश्विक वित्त व्यवस्था में इसलिए अमेरिका का स्थान नहीं ले सकता कि वहां नियम-कानून का पालन नहीं होता और यह ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बन जाने व उसके तांडव शुरू कर देने के बाद भी कहा जा रहा था। 
    
शोषण और दमन वाली वर्गीय व्यवस्था में कानून, कानून का शासन तथा व्यवस्था इत्यादि का खास मतलब होता है और उसकी खास गति होती है। वर्गीय व्यवस्था में कानून और कानून व्यवस्था का मतलब होता है सम्पत्तिवान वर्गों के हित में पूरे समाज को संचालित करना। ये ही सम्पत्तिवान वर्ग शासक वर्ग भी होते हैं यानी ये ही प्रत्यक्षतः या परोक्षतः शासन करते हैं। सारा शासन इन्हीं के हित में चलता है। नियम-कानून और कुछ नहीं बल्कि इसी सब को व्यवस्थित ढंग से करने के प्रावधान होते हैं। कानून लागू करने और कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए ही समूची राज्य व्यवस्था होती है, खासकर पुलिस-सेना, न्यायालय, जेल, इत्यादि। ये ही राज्य व्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण अंग होते हैं। इसी के माध्यम से शासक वर्ग शासित वर्गों को दबाकर रखते हैं। इस तरह कानून व्यवस्था हिंसा पर टिकी होती है भले ही हिंसा का हर समय प्रयोग न हो रहा हो। यह हिंसा शासक वर्गों के पक्ष में शासित वर्गों के खिलाफ होती है हालांकि कभी-कभी शासक वर्ग आपस में भी हिंसा पर उतर आते हैं। 
    
जो बात देश के भीतर लागू होती है, वही बदले हुए रूप में दुनिया के पैमाने पर भी लागू होती है। शासक अपने शासन का विस्तार अपने देश-समाज के बाहर भी करना चाहते हैं। आधुनिक पूंजीवादी राष्ट्र-राज्य के पहले तो शासन की कोई निश्चित सीमाएं भी नहीं होती थीं। जो शासक जितने इलाके पर कब्जा कर लेते थे उतने पर उनका शासन कायम हो जाता था। आधुनिक काल की शुरूआत में 1648 में वेस्टफालिया की संधि के बाद राष्ट्र-राज्य की सीमाओं को मान्यता देने का चलन शुरू हुआ और बीसवीं सदी में यह अपनी परिणति तक पहुंचा। जिन देशों और राष्ट्रों को आज मान कर चला जाता है वे अपने वर्तमान स्वरूप में अधिकांशतः बीसवीं सदी में ही अस्तित्व में आये। 
    
इसके पहले आधुनिक काल की शुरूआत में ही मुट्ठी भर यूरोपीय देशों के शासकों ने बाकी दुनिया पर कब्जा करना शुरू कर दिया था जो उन्नीसवीं सदी के अंत तक लगभग मुकम्मल हो गया। इसकी उलटी प्रक्रिया भी उन्नीसवीं सदी में शुरू हुई यानी आजादी का संघर्ष जो बीसवीं सदी में काफी तीखा हो गया। बीसवीं सदी में जहां प्रथमार्द्ध में कब्जाकारी साम्राज्यवादियों के बीच उपनिवेशों के बंटवारे को लेकर दो-दो विश्व युद्ध हुए वहां उसके उत्तरार्द्ध में आजादी के संघर्ष प्रमुख हो गये। अंततः बीसवीं सदी के अंत तक वह दुनिया उभर कर सामने आई जिसे हम जानते हैं। यह दुनिया देशों में विभाजित है। देशों के भीतर पूंजीपति शासक वर्ग हैं तथा मजदूर व अन्य मेहनतकश शासित वर्ग। इन देशों के भीतर राज्य सत्ता और उसकी हिंसा पूंजीपति वर्ग के शासन को बनाये रखने का मुख्य औजार होती है। 
    
लेकिन पूंजीपति वर्ग केवल अपने देश के मजदूर-मेहनतकश का शोषण कर संतुष्ट नहीं होता। वह अन्य देशों के मजदूरों-मेहनतकशों का भी शोषण करना चाहता है। किसी देश का पूंजीपति वर्ग जितना बड़ा और ताकतवर होता है, उसकी आकांक्षा इस मामले में उतनी ही बड़ी होती है। साम्राज्यवादी पूंजीपति वर्ग इसमें सर्वोच्च होता है। लेकिन इनमें भी सब बराबर नहीं होते। किसी देश का साम्राज्यवादी पूंजीपति वर्ग ज्यादा बड़ा और मजबूत होता है तो किसी का अपेक्षाकृत कमजोर। इन्हीं सब वजहों से दुनिया भर के विभिन्न देशों के पूंजीपति वर्ग में एक श्रेणीक्रम पैदा हो जाता है। कोई शिखर पर होता है तो कोई तलहटी में। देशों के बीच संबंध मूलतः इसी हैसियत से तय होते हैं हालांकि देशों का इतिहास, उनकी भू-राजनीतिक स्थिति, उनकी आंतरिक व्यवस्था, इत्यादि भी इसमें भूमिका अदा करते हैं। 
    
देशों के बीच संबंधों में भी अंततः ताकत ही निर्णायक होती है। आर्थिक और सामरिक दोनों मिलकर यह तय करते हैं। तात्कालिक तौर पर सामरिक ताकत के महत्वपूर्ण होते हुए भी अंततः आर्थिक ताकत ज्यादा महत्वपूर्ण साबित होती है। 
    
जैसे किसी देश के भीतर शासक और शासित वर्गों के संबंधों को नियम-कानून से सुव्यवस्थित रूप दिया जाता है तथा राज्य सत्ता की हिंसा से उसे सुनिश्चित किया जाता है वैसे ही पूरी दुनिया के पैमाने पर देशों के संबंधों को भी ताकत से तय करने के बाद नियम-कानून से व्यवस्थित किया जाता है और हिंसा से उसे बनाये रखा जाता है। आज इसे ही विश्व व्यवस्था कहा जाता है। 
    
आज जिस विश्व व्यवस्था की इतनी चर्चा है तथा जिसके बिखरने की बात हो रही है वह स्वयं भयंकर हिंसा के द्वारा अस्तित्व में आई थी। दोनों विश्व युद्ध क्रमशः चार और छः साल चले थे तथा उनमें क्रमशः एक और पांच करोड़ लोग मारे गये थे। जैसा कि पहले कहा गया है, ये दोनों विश्व युद्ध साम्राज्यवादी देशों के बीच बाकी दुनिया के फिर से बंटवारे के युद्ध थे। 1914 से शुरू हुए इस भीषण संघर्ष का जब 1945 में समापन हुआ तो पुराने रूसी, अतोमन, जापानी, जर्मन तथा इतालवी साम्राज्यवादी पराजित होकर फिलहाल दोयम स्थिति में धकेल दिये गये थे तथा फ्रांस व इंग्लैण्ड विजेता किन्तु जर्जर थे। इन सबके बरक्स सं.रा. अमेरिका नयी और सबसे बड़ी साम्राज्यवादी ताकत बन कर उभरा था। उसे दोनों विश्व युद्धों में बहुत कम नुकसान हुआ था और कुल मिलाकर उसने हासिल ही किया था। इस तरह सं.रा.अमेरिका पूंजीवादी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत तथा उनका नेता बनकर उभरा था। उसे चुनौती मिल रही थी तो समाजवादी सोवियत संघ से जो नये समाजवादी खेमे का नेता था। 
    
1945 में जिस पूंजीवादी विश्व व्यवस्था का निर्माण हुआ वह अमरीकी वर्चस्व को स्वीकार करती थी। उसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र संघ सब जगह वीटो हासिल था। उसने सारी दुनिया में अपने सैनिक अड्डे कायम कर रखे थे। सब जगह उसकी हिंसा की प्रत्यक्ष मौजूदगी थी। बाकी साम्राज्यवादी और पूंजीवादी देशों के शासक इसके साथ तालमेल बैठाकर चलते थे- टकराव और सहमति इसके मातहत थी। 
    
अमरीकी साम्राज्यवादी इस विश्व व्यवस्था के नियमों-कानूनों से केवल उसी हद तक बंधे थे जिस हद तक यह उनके हित में थी। उन्हें इन नियमों-कानूनों का उल्लंघन करने में जरा भी दिक्कत नहीं होती थी। नियम आधारित व्यवस्था का जाप करते हुए वे स्वयं उसका लगातार उल्लंघन करते रहते थे। पिछले अस्सी सालों में उन्होंने एक सौ से ज्यादा देशों में हस्तक्षेप किया है जिसमें सैनिक तख्तापलट से लेकर सैनिक हमला तक सब शामिल है। 
    
बाद के सालों में अमेरिका की ताकत के सापेक्षिक पराभव के बाद भी पूंजीवादी दुनिया में सबसे बड़ी ताकत की स्थिति बनी रही है। उसे केवल सोवियत खेमे से चुनौती मिलती रही पर 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद यह चुनौती समाप्त हो गयी। कुछ समय के लिए अमेरिका एकछत्र प्रभुत्व की स्थिति में आ गया। पर यह तात्कालिक ही साबित हुआ। नयी सदी के दूसरे दशक में रूसी व चीनी साम्राज्यवादियों के तेज उभार ने उसे बदहवास कर दिया। 
    
पिछले अस्सी सालों में अमरीकी साम्राज्यवादी नियम आधारित व्यवस्था की बात करते हुए स्वयं को नियमों-कानूनों से ऊपर रखे हुए थे क्योंकि वे वैसा कर सकते थे। अक्सर उन्हें खुलेआम नियमों-कानूनों का उल्लंघन करने की जरूरत नहीं पड़ती थी क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं उनके हिसाब से ढली हुई थी। जहां ऐसा नहीं होता था, वहां वे अपनी ताकत के बल पर बाकियों से अपने मन की करा लेते थे। ऐसे में उन्हें यह घोषणा करने की जरूरत नहीं पड़ती थी कि नियम आधारित व्यवस्था को नहीं मानते। इसके विपरीत, अपनी गैर-कानूनी गतिविधियों को भी नियम-कानून से जायज ठहराने की कोशिश करते थे। उनके शिकार लोगों को उनके वास्तविक चरित्र के बारे में कोई भ्रम नहीं होता था पर वे अपने देश की जनता को बरगलाने में कामयाब होते थे। 
    
पिछले एक-दो दशकों में अमरीकी साम्राज्यवादियों को यह लगने लगा है कि चीजें उनके हाथ से निकल रही हैं। कि 1945 से चली आ रही विश्व व्यवस्था अब उनके लिए उतनी कारगर नहीं रह गयी है। इसके भीतर वे अपने पराभव को नहीं रोक पा रहे हैं। इसके भीतर वे चीनी साम्राज्यवादियों के उभार को नहीं रोक पा रहे हैं। 
    
इस एहसास के गहराने के साथ अमरीकी साम्राज्यवादी अब क्रमशः उस विश्व व्यवस्था को जुबान से भी नकारने पर उतर आये हैं जिसका व्यवहार में वे पहले अक्सर ही उल्लंघन करते रहते थे। अब वे किसी भी बंधन को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। ट्रंप के नेतृत्व में उन्होंने घोषित कर दिया है कि वे अब सब कुछ नंगे ढंग से ताकत के बल पर तय करेंगे। 
    
‘नियम आधारित विश्व व्यवस्था’ का यह खुलेआम नकार और वह भी उसके सबसे बड़े प्रस्तोता तथा सबसे बड़े लाभार्थी द्वारा आज की वैश्विक स्थिति की लाक्षणिक विशेषता है। पर इस बात का संकेत है कि समूची पूंजीवाद व्यवस्था भयंकर अस्थिरता के दौर में प्रवेश कर रही है। ईरान पर अमरीकी साम्राज्यवादियों का हमला इस सबकी अभिव्यक्ति है। साथ ही यह उस प्रक्रिया को और त्वरित भी करेगा। 
    
विश्व व्यवस्था को अव्यवस्था में ढकेलने को अमरीकी साम्राज्यवादियों की यह कार्रवाई केवल उनके बाहरी सापेक्षिक पराभव का ही परिणाम नहीं है। यह साथ ही उनके आंतरिक संकट की भी अभिव्यक्ति है। बल्कि आंतरिक पराभव और संकट ही मूल में है। ट्रंप इसका मूर्त रूप है जो आंतरिक पराभव और संकट को मुद्दा बनाकर सत्ता में आया और अब बाहरी अव्यवस्था के द्वारा इस संकट से मुक्ति का रास्ता तलाश रहा है। 
    
लेकिन इस संकट से जूझने वाले अमरीकी साम्राज्यवादी अकेले नहीं है। पश्चिमी साम्राज्यवादी भी इससे जूझ रहे हैं। चीनी साम्राज्यवादी भी इससे अछूते नहीं है। पिछड़े पूंजीवादी देशों का तो कहना ही क्या?
    
आज की दुनिया में आंतरिक और बाह्य अस्थिरता व अव्यवस्था एक ही व्यापक संकट की अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं। यह संकट है समूची पूंजीवादी व्यवस्था का चौतरफा संकट। इसी संकट की अवस्था में ही दुनिया के सबसे ताकतवर देश का राष्ट्रपति एक समूची सभ्यता को नेस्तनाबूद करने की धमकी दे सकता है। यह समूची पूंजीवादी सभ्यता का ही संकट है। 
    
ईरान पर अमरीकी हमले के तात्कालिक वैश्विक राजनीतिक निहितार्थ हैं। इसके वैश्विक समीकरणों के बनने-बिगड़ने के भी निहितार्थ हैं। पर इनसे भी बड़ा वह नितिहार्थ है जो दुनिया भर के तमाम शासकों के इस संबंध में रुख से अभिव्यक्त हो रहा है। यह दिखा रहा है कि यदि पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासकों को ऐसे ही छोड़ दिया गया तो वे पूरी मानव सभ्यता को ही नष्ट करने की ओर जा सकते हैं। 
    
इस भयंकर परिणति से नियम आधारित विश्व व्यवस्था के बारे में भली-भांति बातें करने मात्र से नहीं बचा जा सकता।   

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