रूस-यूक्रेन युद्ध और शांति की राह
अमेरिकी बड़बोले राष्ट्रपति ट्रम्प एक बार फिर शीघ्र ही रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त कराने का दावा कर रहे हैं। हालांकि उनके बीते एक वर्ष में ऐसे अनगिनत दावों की विफलता ने साबित
अमेरिकी बड़बोले राष्ट्रपति ट्रम्प एक बार फिर शीघ्र ही रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त कराने का दावा कर रहे हैं। हालांकि उनके बीते एक वर्ष में ऐसे अनगिनत दावों की विफलता ने साबित
अफ्रीकी महाद्वीप का जिक्र भयावह गरीबी और आपसी युद्धों में उलझे रहने के बतौर है। अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी पीठ इस बात पर थपथपाते हैं कि उन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप के देशों के बीच चलने वाले युद्धों को रुकवाया। लेकिन ये युद्ध और झड़पें अभी भी जारी हैं। अमरीकी और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच इस क्षेत्र की खनिज सम्पदा और साधन स्रोतों के लिए संघर्ष चल रहे हैं। ये दिनों-दिन तीव्र होते जा रहे हैं।
बीसवीं सदी ने दो विनाशकारी विश्व युद्धों को देखा था। अब हम इक्कीसवीं सदी में रह रहे हैं। 21वीं सदी का भी एक चौथाई अब खत्म होने को है। अक्सर ही बातें होती हैं कि तीसरा विश
ऐसी स्थिति में जहां अमरीकी साम्राज्यवादियों का अपने सहयोगी यूरोपीय साम्राज्यवादियों के साथ मतभेद व टकराव बढ़ रहे हों, अमरीका और रूस के बीच, अमरीका और चीन के बीच तथा चीन और भारत के बीच तरह-तरह के विवाद और टकराव बढ़ते जा रहे हों, वहां जी-20 की एक सकारात्मक मंच के बतौर न तो अब साम्राज्यवादियों के लिए कोई खास उपयोगिता रह गयी है और न ही दूसरे साम्राज्यवादी देशों- चीन और रूस- के लिए इसकी प्रभावशाली भूमिका बनने की संभावना है।
इजरायल की हत्यारी हुकूमत युद्ध विराम के बाद गाजा पट्टी में ‘स्क्विड गेम’ टी वी वेब सीरीज सरीखा खेल खेलकर निर्दोष फिलिस्तीनियों का कत्लेआम मचा रही है। युद्ध विराम के बाद इ
पूंजीवादी शासकों से लेकर आम जन तक दुनिया में आज हर कोई पर्यावरण को हो रहे नुकसान के खतरों को जानता है। हर कोई जानता है कि पर्यावरण सुरक्षा एक महत्वपूर्ण प्रश्न बना हुआ है
अफ्रीका के देश सूडान में बड़े पैमाने पर नरसंहार जारी है। यह लम्बे समय से चल रहा है। एक तरफ सूडान की केन्द्रीय सरकार की सेना है। यह केन्द्रीय सरकार अल बुरहान नामक जनरल के न
पिछले रविवार को, मैं मध्य गाजा पट्टी के अल-जावेदा में अपने परिवार के तंबू से बाहर निकला और पास के ट्विक्स कैफे की ओर चल पड़ा, जो फ्रीलांसरों और छात्रों के लिए एक सह-कार्य
मोदी सरकार के सामने संकट यही है कि वह रूस से मिल रहे सस्ते तेल को चुने या फिर अमेरिका के साथ प्रति वर्ष होने वाले कुल व्यापार लाभ को। अपनी फितरत के अनुसार तो भारत सरकार और भारतीय पूंजीपति यही चाहते हैं कि उनको दोनों जगह से होने वाला लाभ बदस्तूर जारी रहे। किन्तु डोनाल्ड ट्रंप इस सारे खेल में भाजपाईयों और उनके यारों का गुरू है। उसने वर्तमान और भविष्य के द्विपक्षीय व्यापार में भारत को हो रहे लाभ को अपना हथियार बनाया और अपनी वैश्विक शक्ति संतुलन की राजनीति के मोहरे सैट करके मोदी सरकार को ‘पटरी’ पर ला डाला।
वेनेजुएला की मादुरो सरकार ट्रम्प को बर्दाश्त नहीं है? क्यों?
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।