अमेरिकी घेरेबंदी का मुकाबला करती क्यूबाई महिलायें
वेनेजुएला के तेल पर अमेरिकी कब्जे को सुनिश्चित करने के बाद अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने क्यूबा की घेराबंदी बढ़ा दी है। क्यूबा को अभी तक वेनेजुएला से सस्ता तेल सप्लाई होता र
वेनेजुएला के तेल पर अमेरिकी कब्जे को सुनिश्चित करने के बाद अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने क्यूबा की घेराबंदी बढ़ा दी है। क्यूबा को अभी तक वेनेजुएला से सस्ता तेल सप्लाई होता र
लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?
इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं
हांगकांग (चीन) और लास वेगास (अमेरिका) पूंजीवादी दुनिया के चमचमाते शहरों में से हैं। हांगकांग लगभग एक शताब्दी से प्रमुख औद्योगिक-व्यापारिक केन्द्र रहा है। वहीं लास वेगास आ
अस्तु, अमरीकी साम्राज्यवादी इस समय जो कुछ कर रहे हैं वह नया नहीं है। तब फिर कुछ लोगों को यह नया क्यों लग रहा है? क्यों उन्हें साम्राज्यवाद की वापसी होती दीख रही है?
कनाडा के प्रधानमंत्री ने ये सारे तर्क यूरोपीय साम्राज्यवादियों को झकझोरने के इरादे से दिये थे। कनाडा के प्रधानमंत्री की इन बातों ने तालियां तो बटोरीं लेकिन यूरोपीय साम्राज्यवादी अमरीकी साम्राज्यवादियों के समक्ष तत्काल डटकर खड़ा होने की स्थिति में नहीं थे।
ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान, 2019 में पहली बार ग्रीनलैंड को खरीदने की इच्छा व्यक्त की थी। यह द्वीप 300 वर्षों से डेनमार्क का हिस्सा रहा है, और डेनमार्क और ग्रीन
नये वर्ष 2026 की शुरूआत के साथ अमेरिकी सरगना ट्रम्प ने नया चोला पहन लिया है। उसने ‘शांति दूत’ का अपना पुराना स्वघोषित चोला उतार कर क्रूर हत्यारे का रूप धर लिया है। वैसे त
ट्रम्प ने अपने राष्ट्रपति पद के चुनाव प्रचार के दौरान अमरीकी बड़ी तेल कम्पनियों से वायदा किया था कि वे वेनेजुएला के तेल भण्डार पर उनका नियंत्रण फिर से कायम कर देंगे। ट्रम्प के चुनाव प्रचार में इन बड़ी तेल कम्पनियों ने भारी धन चंदे के रूप में दिया था। वेनेजुएला में ह्यूगो चावेज ने इन कम्पनियों की नियंत्रणकारी स्थिति को समाप्त करके राज्य के मालिकाने की कम्पनी बना दी थी। अब ये तेल कम्पनियां राष्ट्रीयकरण किये जाने के बाद अपने नुकसान के हरजाने की मांग करेंगी। सबसे बढ़कर तो अब वेनेजुएला के तेल भण्डार पर इनका कब्जा होगा।
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।