आलेख

उद्धारक विचारधारा की तलाश

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

शिक्षा व रोजगार : दशा और दुर्दशा

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

काकरोच सरदार और समाजवादी जनतांत्रिक मोर्चा

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

तितली प्रभाव: कुछ इतिहास से, कुछ वर्तमान में

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

साधो, ठगवा नगरिया लूटल हो!

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

पश्चिम एशिया के संकट का वैश्विक प्रभाव

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

युद्ध अन्य साधनों से राजनीति का ही जारी रूप है!

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

आपातकाल : तब और अब

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

पिकेटी का ग्लोबल जस्टिस प्रोजेक्ट: साम्राज्यवाद की पैरोकारी

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।