आलेख

काॅकरोच जनता पार्टी - हिंदू फासीवादी व सही राह

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जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

अमेरिका और चीन: थ्यूसीडाइड्स फांस?

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शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

अमेरिका द्वारा ईरान पर नया हमला: इसके दूरगामी परिणाम

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

हिंदू फासीवाद, चुनाव आयोग और विधानसभा चुनाव

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हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

साम्राज्यवाद और अभिजात मजदूर वर्ग

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दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।

पतित पूंजीवाद के दौर में शासक वर्ग और जनता

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मजदूर-मेहनतकश जनता की दुनिया भर में हो रही लूट के बंटवारे को लेकर शासकों में टकराव है जो भांति-भांति से प्रकट हो रहा है। यूक्रेन पर रूसी हमला तथा ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमला इसी का परिणाम है। पर स्वयं लूट के मामले में दुनिया भर के पूंजीवादी शासकों की एकता है। लूट के मामले में देशी-विदेशी पूंजी की एकता है जबकि लूूट के बंटवारे को लेकर इनके बीच टकराव है।

होरमुज जलडमरूमध्य - ईरान के हाथ में एक सशक्त हथियार

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एक बात निश्चित है कि इस युद्ध के दौरान ईरान पश्चिम एशिया में एक मजबूत बड़ी शक्ति के बतौर उभरा है। इसके हाथ में होरमुज जलडमरूमध्य का नियंत्रण आना एक बड़ा हथियार है। उसने इस हथियार का बखूबी इस्तेमाल किया है। इसने अमरीकी साम्राज्यवादियों की दादागिरी को चुनौती दी है। और इस चुनौती में होरमुज के हथियारीकरण की अहम भूमिका है। यह आणविक बम से भी अधिक कारगर भूमिका निभा रहा है। 

अंतर्राष्ट्रीय नियम-कानून, व्यवस्था और अव्यवस्था

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देशों के बीच संबंधों में भी अंततः ताकत ही निर्णायक होती है। आर्थिक और सामरिक दोनों मिलकर यह तय करते हैं। तात्कालिक तौर पर सामरिक ताकत के महत्वपूर्ण होते हुए भी अंततः आर्थिक ताकत ज्यादा महत्वपूर्ण साबित होती है। 

अमरीका-ईरान समझौता वार्ता असफल- आगे क्या?

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लेकिन इसके बावजूद, अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी रणनीतिक पराजय स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। यदि इसे वह स्वीकार कर लें तो उसकी धौंसपट्टी, हमले, हुकूमत परिवर्तन की सारी कोशिशों पर पलीता लग सकता है? वैसे भी दुनिया भर में उसकी साख गिर रही है और प्रभाव भी कमजोर होता जा रहा है। 

आलेख

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।