UPSC की बीमारी

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शुरूआती समय में UPSC की तैयारी की सोचता था तो मुखर्जीनगर और बत्रा सिनेमा स्वप्नलोक की दुनिया जैसा था। मुझे लगता था कि बौद्धिकता और नैतिकता का केंद्र यहीं पर होगा क्योंकि IAS, IPS और IFS से ज्यादा पढ़ा-लिखा और समझदार कौन हो सकता है? 
    
उस समय मैं इंटर में arts लेकर पढ़ रहा था। मोतिहारी में जिस कोचिंग में पढ़ता था उस शिक्षक के बारे में अफवाह फैली हुयी थी कि ये दिल्ली के मुखर्जीनगर से पढ़कर आये हैं। उस दिन मुखर्जीनगर मेरे लिए रहस्य का विषय हो गया था कि दिल्ली तो ठीक है लेकिन मुखर्जीनगर पर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है। लेकिन धीरे-धीरे क्लास की हलचलों से पता चला कि मुखर्जीनगर एक तपस्या लोक है यह कोयले से हीरे और एक सामान्य विद्यार्थी से कलेक्टर बनने की कर्मस्थली है। लेकिन मैं इस अंधेरी दुनिया के भयानक सच से अनभिज्ञ था। 
    
यह यूपीएससी की तैयारी को आसान बनाने वाली कोचिंगों का हब है, जो विद्यार्थी को तैयारी में बहुत सहायता करते हैं जिससे उनका माउंटेएवरेस्ट जैसा सफर आसान हो जाता है। उसी समय नीलोत्पल मृणाल की बुक ‘‘dark horse’’  मैंने पढ़ी थी जहां सामान्य से परिवार से निकलकर आने वाला संतोष मेहनत करके IPS बन जाता है। एक समय उसके पास पैसा नहीं होता है और बिल्कुल अकेला हो जाता है तो उसे उसके शिक्षक मदद करते हैं। मैं भी इसी सोच में रहता था कि कोई न कोई टीचर मुझे भी मिल ही जाएगा जो मुसाफिर को मंजिल तक पहुंचा ही देगा। इस पुस्तक में मुखर्जीनगर का यथार्थ से इतर थोड़ा बहुत जादुई चित्रण मिलता है जिसको देखकर स्टूडेंट्स इस शहर में आने के लिए लालायित और उत्साहित हो जाते हैं। 
    
आज जब मैं खुद मुखर्जीनगर में रह रहा हूं (एक समय जब मैं 12जी पढ़ता था तो यह स्वप्नलोक की दुनिया हुआ करता था) तो मालूम चल रहा है कि यहां की पूरी दीवार बालू के ढेर से बनी हुई है। जब तक हवा नहीं आ रही है तब तक खड़ी है लेकिन हवा को कौन रोक सका है? इसके भीतर छिपी हुई एक भयावह और खतरनाक दुनिया है जहां विद्यार्थी रहते नहीं हैं बल्कि घुट-घुट कर जी रहे हैं। वह परिवार, रिश्तेदार, दोस्त से बात करना बंद कर दिए हैं क्योंकि उनके पिताजी और परिवार नचेब की गहरी खाई से वाकिफ नहीं हैं इसलिए जब भी फोन करते हैं तो एक ही सवाल पूछते हैं ‘‘नौकरियां कब होई बबुआ’’। 
    
मुखर्जीनगर आने वाले अधिकतर बच्चों की उम्र 20 से 25 के बीच है जिस समय उन्हें खुलकर जीना चाहिए। 
    
मैं देखता हूं कि UPSC साल में एक बार परीक्षा लेती है। उसमें भी वेकेंसी 800 से 1000 के बीच होती हैं और प्रत्येक साल इसमें आवेदक लगभग 10 लाख होते हैं। उसमें भी यह होता है कि एक कैंडिडेट सिलेक्ट हो भी गया वह अगले साल एग्जाम देता है क्योंकि IRS, IPS नहीं चाहिए बल्कि उसे IAS बनना है। सोचता हूं 10 लाख आवेदक हैं। प्रत्येक साल हजार सीट अगर ऐसा ही चलता रहा तो करीब 1000 साल लग जाएगा UPSC Servants बनने में (यानी फिर मोहम्मद गौरी 1017 से लेकर नरेंद्र मोदी 2029 के कार्यकाल तक)।
    
मुखर्जीनगर में कोचिंग माफिया बैठे हुए हैं जो चिकनी-चुपड़ी बातों जैसे reels और यूट्यूब के जरिए लुभावने-लुभावने वादे करते हैं। इन वादों से मोहित होकर सामान्य पृष्ठभूमि के बच्चे दिल्ली आ जाते हैं। यहां पर सभी कोचिंग माफियाओं की सांठ-गांठ है जो विद्यार्थी से एक मोटी रकम फीस के रूप वसूलते हैं।
    
फैकल्टी के नाम पर 10 शिक्षकों में से 2 शिक्षक थोड़ा ठीक पढ़ाते हैं बाकी 8 शिक्षकों की इन दोनों टीचर के नाम पर गाड़ी चल रही है। फैसिलिटी के नाम पर तो आप जानते ही हैं कि कुछ दिन पहले करोल बाग में बेसमेंट में लाइब्रेरी थी। जलभराव अधिक होने के कारण पानी बेसमेंट में घुस गया और जिसके कारण 3 बच्चों की जान चली गई। कुछ महीने पहले की घटना है वद हवपदह कोचिंग में आग लग गई। तीसरी मंजिल पर क्लास चल रही थी। किसी तरह बच्चों ने तड़प-तड़प कर अपनी जान बचाई। यह faculty और facility की व्यवस्था का गोरखधंधा जहां इन कोचिंग माफियाओं के लिए पैसा कमाने और बिजनेस बढ़ाने के अलावा विद्यार्थियों का दर्द और पीड़ा से कोई सरोकार नहीं है। 
    
मुखर्जीनगर में बत्रा सिनेमा के आस-पास रूमों की बहुत महंगाई है ऊपर से रूम मालिक के बहत्तर नखरे होते हैं कि एक स्टूडेंट्स से ज्यादा नहीं रह सकते हो, दोस्त को रूम पर नहीं बुला सकते हो। मकानों की बनावट देखी जाए तो पूरी आधारशिला ही गलत है। उसमें कमरों की हालत इतनी जर्जर है कि यदि थोड़ी अधिक बारिश और भूकंप आए तो रूम के मलबे सहित आदमी भी भूमिगत हो जाएगा। फिर भी रूम मालिक बिना किसी सुरक्षा की जिम्मेदारी लिए 1 bhk कमरों का किराया 15,000 और 20,000 रुपया लेता है। 
    
मुझे मुखर्जीनगर में रहते हुए करीब डेढ़ महीना होने वाला है। इस बीच में बहुत सारे upsc aspirants से मिला और उनसे बातचीत की। उनसे बात करके महसूस होता है उनके शब्दों की लय और उच्चारण बता रहे हैं कि उन्होंने जिंदगी के गोल्डन युग को गंवा दिया है। वह जब यहां आए तो उनकी उम्र 20-22 के बीच थी। अब उनकी उम्र 25-27 की हो गई। जिस दौर में उन्हें नई जगह घूमने जाना चाहिए था और नए दोस्त बनाने चाहिए थे लेकिन दुर्भाग्य! राष्ट्रीय बीमारी यानी (सिविल सेवा की तैयारी) के शिकार हो गए, सिविल सेवा की मायावी दुनिया में फंस गया हूं और निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता है क्योंकि जिंदगी के महत्वपूर्ण पांच वर्ष गुजार दिए हैं, यहां से खाली हाथ घर जाने का मन नहीं करता है। परिवार, रिश्तेदार, पड़ोसी और दोस्त सब पूछते हैं कि अब तक क्या किया?
    
इस सारी नाजुक स्थितियों को देखकर डर लगता है कि ऐसा न हो कि कोटा परिघटना की तरह मुखर्जी नगर में भी विद्यार्थियों की लगातार आत्महत्या जैसे कृत्य न देखने को मिलने लगें। इससे पहले जागरूक होना पड़ेगा। राष्ट्रीय बीमारी (सिविल सेवा तैयारी) से डटकर सामना करना पड़ेगा और कोचिंग माफिया की चिकनी-चुपड़ी बातों का पर्दाफाश करना पड़ेगा।       -शुभचिंतक संतोष

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