एस.आई.आर. : बिहार के बाद अब 12 राज्यों में फासीवादी परियोजना

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चुनाव आयोग बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण कराने के बाद अब इसे पूरे देश पर थोपने को उतारू है। इस सम्बन्ध में 28 अक्टूबर से 7 फरवरी तक 12 राज्यों में एस आई आर की घोषणा चुनाव आयोग कर चुका है। अंडमान-निकोबार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, लक्षद्वीप, पांडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, उ.प्र. व पं.बंगाल वो 12 राज्य हैं जहां एस आई आर का दूसरा चरण शुरू किया जा रहा है। इस तरह अब इन 12 राज्यों के मतदाताओं को खुद को नागरिक व जायज मतदाता साबित करने की दौड़ में जोत दिया गया है। इन राज्यों की 51 करोड़ मतदाता जनता सरकार व चुनाव आयोग की सनक के चलते खुद को जनता साबित करने हेतु कागजात जुटाने की मारामारी झेलने को मजबूर हो गयी है। कहां तो लोकतंत्र में जनता सरकार चुनती थी अब मोदीकाल में सरकार जनता चुन रही है। 
    
विशेष गहन पुनरीक्षण के मसले पर चुनाव आयोग के झूठ एक के बाद एक उजागर होते गये हैं। उस पर चुनावों में भाजपा के पक्ष में काम करने से लेकर मतदाता सूची में इस अनुरूप बदलाव के गम्भीर आरोप लगे हुए हैं। पर इन आरोपों का जवाब देने के बजाय वह पूरे देश में यह गहन पुनरीक्षण कराने पर उतारू है। एक ऐसे वक्त में जब चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा गर्त में पहुंची हुई हो तब मतदाताओं का इस एस आई आर प्रक्रिया के प्रति आशंकित होना स्वाभाविक है कि यह उनसे मत देने के अधिकार को छीनने की प्रक्रिया है। 
    
पहले पहल चुनाव आयोग ने दावा किया कि 2003 में भी ऐसा गहन पुनरीक्षण हुआ और आजादी के बाद से ऐसे 8 पुनरीक्षण हो चुके हैं। पर चुनाव आयोग 2003 के पुनरीक्षण की विज्ञप्ति को देने से बचता रहा। अंत में जब किसी तरह 2003 के पुनरीक्षण की विज्ञप्ति सामने आयी तो पता चला कि चुनाव आयोग पहले की प्रक्रिया के उलट एकदम नयी प्रक्रिया अपना रहा है। 2003 के पुनरीक्षण में आम तौर पर मतदाताओं से कोई कागजात नहीं मांगे गये थे। बी एल ओ घर-घर जाकर खुद जानकारी हासिल कर फार्म भर परिवार के मुखिया के हस्ताक्षर करा लेते थे। केवल एक जगह से दूसरी जगह भेजे गये लोगों को ही कागजात दिखाने होते थे। तब स्पष्ट कहा गया था कि यह पुनरीक्षण नागरिकता तय नहीं करता। 
    
पर अब पुनरीक्षण के नाम पर बिहार में चुनाव आयोग ने जो किया वह नागरिकता तय करना ही था। यह एक किस्म का एन आर सी  (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) तैयार करना था। चुनाव आयोग ढिठाई से बोल भी रहा था कि जो नागरिक नहीं है उसका नाम काट दिया जायेगा। बिहार एस आई आर में पहले के 7.89 करोड़ मतदाताओं में 65 लाख मतदाताओं के नाम काटे गये, 3.66 लाख अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाये गये व 21.93 लाख नये मतदाता जोड़े गये। इस तरह अंतिम सूची में 7.42 करोड़ मतदाता हैं। चुनाव आयोग यह बताने को तैयार नहीं है कि हटाये गये 68 लाख नामों में कितनों से नागरिकता छीनी गयी और कितने दूसरी जगह चले गये। इस तरह बिहार का अंतिम परिणाम भी लाखों मतदाताओं से वोट का अधिकार छीनने का खतरा सामने ला रहा है। 
    
अब पूरे देश में यह नागरिकता साबित करने की कवायद भारी असंतोष का जरिया बनेगी। असम की एन आर सी से 19 लाख लोगों से नागरिकता छीनी गयी थी। बिहार की इस अघोषित एन आर सी से लगभग 65 लाख नाम कटे तो पूरे देश में इस कवायद से कितने लोगों की नागरिकता खतरे में पड़ेगी, इसे समझा जा सकता है। 
    
एक ऐसे वक्त में जब धड्ल्ले से मुसलमान मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने के आरोप जगह-जगह सामने आ रहे हैं, तब समझा जा सकता है कि इस अघोषित एन आर सी का पहला शिकार कौन बनेगा। हालांकि दलित-महिलायें मजदूर-आदिवासी जिन पर भी एक जगह से स्थानान्तरित होने व कोई कागजात का प्रमाण न होने की संभावना है वे सभी इसकी चपेट में आयेंगे। 
    
फासीवादी मोदी सरकार अब अपनी जनता खुद चुन रही है। चुनाव आयोग जनता चुनने के इस अभियान का अगुआ बना है। जनता हैरान है कि उसने जिन्हें शासक चुना वे ही जनता को जनता की श्रेणी से बाहर करने पर उतारू हैं। शासक गुरूर में हैं कि वे अपनी जनता चुन वर्षों तक राज करते रहेंगे। हैरान-परेशान जनता भी अपने पड़ोस नेपाल-बांग्लादेश की तरफ देख रही है कि जब शासक इतने मगरूर हो जायें तो उनसे कैसे निपटा जाता है। 

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