उत्तराखंड-उन्नाव की बेटियों को न्याय दिलाने के लिये विरोध प्रदर्शन
उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में हुये नये खुलासे में वीआईपी के रूप में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम उर्फ ‘गट्टू’ क
उत्तराखंड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में हुये नये खुलासे में वीआईपी के रूप में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम उर्फ ‘गट्टू’ क
यह हमेशा से होता रहा है कि जब भी शोषित-उत्पीड़ित जनता अपनी न्यायसंगत मांगों के लिए उठ खड़ी होती है और अपना संगठित आक्रोश व्यक्त करती है तो व्यवस्थापोषक लोग शांति और संयम की अपील करके उनको ठंडा करने की कोशिश करते हैं, ताकि उनका लूट का तंत्र चलता रहे। उनके लिए शांति और व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण होती है। न्याय की मांग को वे व्यवस्था के लिए खतरा मानते हैं।
वैसे तो उस समय सारी दुनिया में ही इस तरह के पूंजीवादी विकास के रास्ते की धूम थी पर गांधी के लिए स्पष्ट था कि किसी धार्मिक पांगापंथी और साम्प्रदायिक नेता के बदले आधुनिक ज्ञान-विज्ञान में यकीन करने वाले नेता के नेतृत्व में इस रास्ते पर चलना ज्यादा सुगम होगा। इस तरह ज्यादातर धार्मिक पोंगापंथी पूंजीपतियों के लिए भी नेहरू ज्यादा माकूल नेता बनते थे। इसी वजह से यह हुआ कि इन्हीं पूंजीपतियों से चंदा वसूल कर कांग्रेस पार्टी का खर्चा चलाने वाले पटेल के बदले नेहरू प्रधानमंत्री बन गये जो संगठन के रगड़-घिस्स वाले काम के बदले ‘हाई पालिटिक्स’ में ज्यादा रुचि रखते थे।
हिटलर की आत्मा के भारत के भीतर यात्रा के 100 साल हो चुके हैं। एक ओर यह सत्ता के शीर्ष पर विराजमान है तो दूसरी तरफ अब हर शहर की गलियों में ये मौजूद है। इनके प्रभाव में नफर
ब्राजील में 15 दिसंबर को सरकारी तेल कम्पनी पेट्रोब्रास के मजदूरों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा कर दी और उसके बाद सरकारी डाक विभाग करिओस के कर्मचारियों ने भी हड़ताल कर द
गिग एंड प्लेटफार्म सर्विस वर्कर्स यूनियन (जीआईपीएसडब्ल्यूयू) के आह्वान पर, भोजन और अन्य ऐप-आधारित ‘‘डिलीवरी पार्टनर’’ ने ‘‘सुरक्षा, संरक्षा और सम्मान’’ के अधिकार की मांग
विवाह लगभग समाप्त हो चुका है। सुबह-सुबह खुले आसमान के नीचे ओस टपक रही है। दूल्हे के परिवारजन ठंड से बचने के लिए अलाव के इर्द-गिर्द बैठे हुए हैं। हंसी-खुशी और ससुराल की कम
इस वर्ष हमारे देश में जो-जो कुछ घटा (भारत-पाकिस्तान युद्ध, कथित आतंकवादी घटनाएं, पंजाब व अन्य राज्यों में बाढ़ से तबाही, गिरता रुपया, बढ़ती जाती बेरोजगारी व महंगाई आदि) उसक
आज के समाज में जातिवाद की जड़ें गहरी मिट्टी में गड़ी हैं। इनकी जड़ों को समूल नष्ट करने के लिए कई समाज सुधारकों-क्रांतिकारियों-समाज सेवकों ने अपने सारे जीवन को लगा दिया पर जा
हिन्दू समाज महिलाओं-बच्चियों को देवी के रूप में आदि काल से पूजता आ रहा है। नेपाल में भी बड़ी संख्या में हिन्दू आबादी रहती है। यहां भी प्राचीन काल से हिन्दू देवी तलेजू के अ
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।