विविध

भारतीय राजसत्ता की खुराक : गर्म, ताजा रक्त

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इस खूनी राजसत्ता की मार भारत का सबसे बड़ा शोषित वर्ग- मजदूर वर्ग हर रोज झेलता है। वर्दीधारी लोग उसे कहीं भी कभी भी बेवजह पीट सकते हैं। फैक्टरी के भीतर, सड़क पर, घर में उसे कहीं भी तंग किया जा सकता है। फैक्टरी दुर्घटना से लेकर आपदा तक में उसकी मौत को आसानी से गिनती से बाहर कर दिया जाता है। अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाने पर उन्हें अक्सर ही लाठी-गोली-जेल का सामना करना पड़ता है। 

अंकिता भंडारी हत्याकांड की तीसरी बरसी पर उत्तराखंड के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन

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उत्तराखंड के अंकिता भंडारी हत्याकांड को इस 18 सितम्बर को तीन साल पूरे हो गये हैं लेकिन अंकिता के परिजनों को अभी भी पूरा इंसाफ नहीं मिला है। इस हत्याकांड के तार सत्ता से स

पंजाब में मेडिकल कैंप का आयोजन

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पंजाब के अमृतसर से 35-40 किमी दूर स्थित गांवों में 23 सितम्बर से मेडिकल कैंप का आयोजन किया जा रहा है। मेडिकल कैंप संयुक्त तौर पर चलाया जा रहा है। इसे संयुक्त रूप से आयोजि

देरी से वेतन दिए जाने पर बैठकी हड़ताल, मिली आंशिक जीत

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गुड़गांव/ शिवम आटो टेक कंपनी बिनोला गुड़गांव में स्थित है। यह कंपनी हीरो मोटो कार्प के लिए कल-पुर्जे बनाती है। इस कंपनी के कई प्लांट हैं। इस कंपनी में तीन

भगतसिंह के जन्म दिवस पर कार्यक्रम

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शहीद भगतसिंह हमारे देश के ऐसे महान क्रांतिकारी रहे हैं जो कि अपने जन्म (28 सितम्बर, 1907) और अपनी शहादत (23 मार्च, 1931) के इतने सालों बाद भी देश के मजदूरों, किसानों और य

पेपर लीक और उत्तराखण्ड सरकार : ना-नुकुर से नकल जिहाद तक

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एक बार फिर उत्तराखण्ड में प्रतियोगी परिक्षाओं के परीक्षार्थी छले गए। 21 सितम्बर, 2025 को हुई संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा पेपर लीक का मामला सामने आने के बाद उत्तराखण्ड स

बेलसोनिका प्रबंधन के मजदूरों पर बढ़ते वैचारिक हमले

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गुड़गांव/ बेलसोनिका फैक्टरी में यूनियन व प्रबंधन के मध्य छंटनी को लेकर हुए संघर्ष को ज्यादा समय नहीं हुआ है। बेलसोनिका यूनियन ने प्रबंधन की छंटनी के खिलाफ

स्पीड पोस्ट

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भीमकाय मशीनों का शोरगुल, धूल और घुटन भरी हवा। सुरक्षा के नाम पर अस्पताल में प्रयोग होने वाला नोज मास्क। शाम तक नाक के भीतर काली लोहा मिश्रित गर्द जम चुकी है। खांसने पर का

आपका नजरिया - बरसाती मौसम और सरकार की लापरवाही का खामियाजा भुगतते मेहनतकश

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हरियाणा का जिला गुड़गांव जो कि मिलेनियम सिटी के नाम से भी जाना जाता है। यह जिला कई वजहों से चर्चा में रहा है। पहला तो यह कि यह हरियाणा की अर्थव्यवस्था के लिए मुख्य जिला बन

नेपाल में जन विद्रोह - रास्ता किधर है?

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पूंजीवादी लोकतंत्र का लुटेरा चेहरा अधिकाधिक उजागर होता जा रहा है। ऐसे में कल यही जनता जब सुस्पष्ट क्रांतिकारी विचारधारा से लैस होकर सड़कों पर उतरेगी तो उसके निशाने पर पूंजीवादी व्यवस्था होगी। तब इस लुटेरी व्यवस्था के साथ पीछे से सक्रिय लुटेरी ताकतों का षड्यंत्र भी ध्वस्त हो जायेगा। और समाजवाद के नये सवेरे का उदय होगा। भारत के सभी पड़ोसी मुल्कों के युवा-आम मेहनतकश अपनी पहलकदमी दिखा चुके हैं। अगला नम्बर निश्चय ही भारत का होगा।

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।