बढ़ते दमन के बावजूद जारी है मजदूरों का संघर्ष

Published
Sat, 05/16/2026 - 15:50
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उत्तर भारत में दो माह पूर्व पैदा हुई मजदूर संघर्षों की लहर लगातार जारी है। मजदूरों के संघर्ष की इस लहर ने पहले हरियाणा-उ.प्र. व उत्तराखण्ड की सरकारों को न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के लिए मजबूर किया और अब यह बढ़ा हुआ वेतन व्यवहार में हासिल करने के लिए मजदूर जगह-जगह संघर्ष कर रहे हैं। निर्लज्जता से पूंजीपतियों के पक्ष में खड़ी भाजपा सरकारों के क्रूर दमनकारी रुख के बावजूद मजदूर लगातार संघर्ष के मैदान में उतर रहे हैं। शासन-प्रशासन पूरी बेशर्मी के साथ फर्जी मुकदमों-लाठी-जेल से उनका दमन कर रहा है पर इस क्रूर दमन के बावजूद वह मजदूरों के न्यायपूर्ण संघर्षों की आवाज को थाम नहीं पा रहा है। 
    
बीते 2 माह के संघर्षों में सैकड़ों फैक्टरियों के मजदूरों ने सड़कों पर उतर कर यह ऐलान सा कर दिया है कि अब जालिम मालिकों-प्रबंधन के शोषण-अपमान को सहने की उनकी सीमा चुक गयी है। कि भारी महंगाई में वे 9-10 हजार के नाम मात्र के वेतन के साथ जिंदगी नहीं चला सकते हैं। 
    
मजदूरों की 25-30 हजार रु. प्रति माह न्यूनतम मजदूरी करने की मांग के उलट भाजपा सरकारों ने नाम मात्र की ही वेतन बढ़ोत्तरी घोषित की। इस नाम मात्र की वेतन बढ़ोत्तरी को भी लागू करने को मालिक वर्ग तैयार नहीं है। इस बढ़ोत्तरी को लागू कराने के लिए भी मजदूरों को सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। मालिक-प्रबंधक पूरी बेहयाई से सरकारों की न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की अधिसूचना को धता बता पुराना वेतन देने की ही कोशिशों में जुटे हैं। सरकारें व शासन-प्रशासन कानून तोड़ने वाले मालिकों-ठेकेदारों पर कार्यवाही करने के बजाय संघर्षरत मजदूरों को ही डराने-धमकाने में जुटे हैं। शासन का बेरहम डंडा मजदूरों के ऊपर ही बरस रहा है। कानून तोड़ने वाले मालिकों के आगे तो यह डंडा सारी अकड़ भूल नतमस्तक हो जा रहा है। 
    
मजदूरों व मजदूर संगठनों के कार्यकर्ताओं के दमन के मामले में उ.प्र. की योगी सरकार जहां सबसे आगे है वहीं हरियाणा व उत्तराखण्ड की भाजपा सरकारें भी कहीं से पीछे नहीं छूटना चाहतीं। इनके बीच मजदूरों का दमन कर पूंजीपतियों की कृपादृष्टि हासिल करने की होड़ सी मची है। नोएडा में हजार मजदूरों को जेल भेजकर, रिहाई पर भी मजदूरों से जब्त मोबाईल इत्यादि न लौटाकर, जगह-जगह मजदूर नेताओं को हाउस अरेस्ट कर, और अंततः गिरफ्तार मजदूर कार्यकर्ताओं पर रासुका लगा उन्हें लम्बे वक्त तक जेल में सड़ाने की साजिश रच योगी सरकार दमन व क्रूरता में अग्रणी बनी हुई है। वहीं हरियाणा सरकार भी डेढ़ माह बीत जाने पर भी मजदूरों व इमके कार्यकर्ताओं को जमानत न मिले इस पर पूरा जोर लगा रही है। इनकी देखा देखी उत्तराखण्ड की धामी सरकार भी हरिद्वार में इमके कार्यकर्ताओं व मजदूरों पर फर्जी मुकदमे, हल्द्वानी में हाउस अरेस्ट की ओर बढ़ रही है। 
    
मजदूरों के स्वतः स्फूर्त संघर्षों को साजिश-षड्यंत्र पाकिस्तानी हाथ होना कहकर बदनाम करने वाली सरकारें दरअसल अपनी करतूतों से अपने पूंजीपरस्त निरंकुश चेहरे को ही बेनकाब कर रही हैं। 
    
दो माह से चल रहे संघर्षों में यद्यपि मजदूर फैक्टरी दर फैक्टरी ही संघर्ष के मैदान में उतर रहे हैं। पर उनकी वेतन वृद्धि, ओवरटाइम के दोगुने भुगतान व अपमान-उत्पीड़न के खात्मे की समान मांग उन्हें एक साथ जोड़ दे रही है। वे एक वर्ग के बतौर पूंजी के शोषण-उत्पीड़न का प्रतिकार कर रहे हैं। 
    
इन संघर्षों में मजदूर शासन-प्रशासन- न्यायालय-पुलिस के पूंजीपरस्त रुख को तो पहचान ही रहे हैं; साथ ही साथ वे सत्तासीन भाजपा व विपक्षी पार्टियों के भी पूंजीपरस्त चेहरों को भी जान-समझ रहे हैं। वे केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों की भी असलियत से वाकिफ हो रहे हैं जो संघर्ष में जुबानी जमा खर्च व रस्मी प्रदर्शनों से अधिक कुछ करने को तैयार नहीं हैं। 
    
साथ ही साथ मजदूर वर्ग अपनी ताकत को भी पहचान रहा है। वह देख रहा है कि अकेले-अकेले मजदूर की कोई हैसियत नहीं होती है और समूह के तौर पर जब मजदूर एक साथ सड़कों पर उतरे तो चंद दिनों में उन्होंने तीन-तीन राज्य सरकारों को झुकने को मजबूर कर दिया। अगर यही मजदूर अपनी क्रांतिकारी विचारधारा से लैस होकर देशव्यापी एकता कायम कर लें तो वे एक ऐसी ताकत बन सकते हैं जो सारी दुनिया उलट-पुलट कर सकती है। 
    
वेतन वृद्धि को लेकर सड़कों पर उतर रहे मजदूरों को इस समझ पर खड़ा होना होगा कि पूंजीवादी व्यवस्था में उनकी लूट-शोषण-अपमान का अंत नहीं हो सकता। कि अपनी मुक्ति के लिए मजदूर वर्ग को एक वर्ग के रूप में संगठित हो पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त कर ऐसी समाजवादी व्यवस्था कायम करनी होगी जहां मजदूर वर्ग ही सत्ता चलायेगा और जो वर्ग-विहीन-शोषण विहीन साम्यवादी समाज कायम करने की ओर समाज को ले जायेगा। यही मजदूर वर्ग का ऐतिहासिक मिशन है। 

4 मजदूर विरोधी श्रम संहितायें लागू कर मजदूरों के खून की आखिरी बूंद को भी निचोड़ मुनाफे में बदलने का सपना संजोए पूंजीपति वर्ग व उसकी सरकारों को मजदूर वर्ग ने स्वतः स्फूर्त संघर्षों से ही सही माकूल प्रत्युत्तर देने का काम किया है। आने वाले वक्त में यह प्रत्युत्तर और कारगर व प्रभावी हो इसके लिए जरूरी है कि मजदूर  वर्ग अपनी क्रांतिकारी विचारधारा से लैस हो और वर्ग के तौर पर एकजुट हो। 

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