सम्पादकीय

युवा और युवा सपनों की कत्लगाह बनता भारत

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आत्महत्या, सड़क हादसे या आगजनी जैसी घटनाओं में मारे जाने वाली युवा आबादी को आसानी से मौत के मुंह में जाने से रोका जा सकता था। परन्तु यदि ऐसा नहीं हो पा रहा है तो इसका कारण सिवा इस बात के क्या है कि हमारी समाज व्यवस्था और उसको चलाने वाला शासक वर्ग ही अंततः इस सबके लिए दोषी है।

मोदी के बारह साल: न उत्तम, न मध्यम, केवल अधम

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मोदी काल में लोकतंत्र (जो कि एक पूंजीवादी लोकतंत्र है) दिनों दिन वहां पहुंच गया है जहां फासीवाद (हिटलर-मुसोलिनी राज) की आहट हर ओर से सुनायी दे रही है। हिन्दू फासीवाद आज के भारत की एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने है। इस हिन्दू फासीवाद को अम्बानी, अडाणी टाटा, मित्तल जैसे सबसे बड़े भारतीय पूंजीपतियों का आशीर्वाद प्राप्त है। 

गहराता सामाजिक आर्थिक संकट और ‘काकरोच जनता पार्टी’

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जैसा कि तय ही था कि जैसे ही पांच राज्यों में चुनाव निपटेंगे वैसे ही गैस, पेट्रोल-डीजल के दामों में आग लगेगी और महंगाई आसमान छूने लगेगी। मई माह के दूसरे पखवाड़े में पेट्रोल-डीजल सौ रुपये प्रति लीटर या उससे भी ज्यादा तक जा पहुंचे। बढ़ती महंगाई के बीच देश का आर्थिक संकट गहराता गया है और उसके साथ सामाजिक संकट भी गहरा रहा है। और इस गहराते सामाजिक संकट ने समाज के हर वर्ग और तबके को मजबूर कर दिया है कि वह अपनी प्रतिक्रिया दे।

हालिया विधानसभा चुनाव: कुछ निष्कर्ष

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इन सभी राज्यों में मजदूर-मेहनतकश जनता के सामने कोई ऐसी पार्टी नहीं थी जो सच्चे अर्थों में उसके हितों, आकांक्षाओं व भविष्य का प्रतिनिधित्व करती थी। विकल्पहीनता उसे एक धूर्त पूंजीवादी नेता या पार्टी के स्थान पर दूसरे धूर्त नेता या पार्टी की ओर ही धकेलती है। हिन्दू फासीवाद के बढ़ते खतरे का सामना इनमें से कोई भी पार्टी करने में सक्षम नहीं है।

ये तो होना ही था

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अप्रैल माह में भारत के मजदूरों खासकर औद्योगिक मजदूरों के सब्र का बांध टूट गया। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एन सी आर) के मजदूर हजारों-हजार की संख्या में सड़कों पर उतर आये। श

अमेरिकी साम्राज्यवाद के हमले व आतंक के साये में ‘मई दिवस’

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यह एक सच्चाई है कि जितने लोग दूसरे विश्वयुद्ध में मारे गये थे उससे कहीं अधिक लोग दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों के हमले, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष युद्ध में मारे जो चुके हैं। और यह भी सच है कि जब तक साम्राज्यवाद, पूंजीवाद जिन्दा रहेगा तब तक मानव जाति का यूं ही कत्लेआम होता रहेगा। 

यह समय : राक्षसी बूढ़ों का समय

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बूढ़े लोग पूरे घाघपने, धूर्तता के साथ दुनिया पर शासन कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रम्प (79), शी जिनपिंग (73), पुतिन (73), लूला (80), मोदी (75) जैसे बूढ़े दुनिया के अधिकांश देशों म

अमेरिकी साम्राज्यवादियों का बढ़ता पागलपन व बहशीपन

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बदमाश ट्रम्प व धूर्त नेतन्याहू का न केवल जनता के बीच बल्कि स्वयं शासक वर्ग की कतारों के बीच भी विरोध तेजी से बढ़ा है। इस कारण इन दोनों के तेवर पहले दिनों के मुकाबले बाद में ढीले पड़ने  शुरू हुए हैं। दोनों ही देशों में ट्रम्प व नेतन्याहू को आगामी महीनों में चुनाव का सामना करना है। युद्ध का लम्बा खिंचना इन दोनों ही धूर्तों के राजनैतिक भविष्य पर संकट खड़ा करने लगेगा। और ठीक यही ईरान चाहता है।

आठ मार्च का दिन इंकलाब व मुक्ति के नाम

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आठ मार्च का दिन मजदूर-मेहनतकश महिलाओं का ऐसा दिन है जब वे तसल्ली से इस बात पर विचार करती हैं कि सही क्या और गलत क्या है। मुक्ति क्या और गुलामी क्या है। उनका अतीत क्या व भविष्य क्या है। कौन उनका साथी है और कौन उनकी मुक्ति की राह में रोड़ा है। 

भारत को लज्जित करते भारत के शासक

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हकीकत में क्या हुआ है? भारत के स्वयंभू राष्ट्रवादियों ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। और एक तरीके से अपने इतिहास को फिर से दुहरा दिया है। आजादी की लड़ाई के समय ये ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के ‘आज्ञाकारी सेवक’ थे और आज ये अमेरिकी साम्राज्यवादियों के आज्ञाकारी अनुचर बने हुए हैं। 

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।