ट्रेड यूनियन एक्ट, 1926 के सौ साल
ट्रेड यूनियन एक्ट, 1926 को अस्तित्व में आये 100 साल पूरे हो चुके हैं। मजदूरों को संगठित होने का कानूनी अधिकार देने वाला यह कानून जब अस्तित्व में आया था तब भारत अंग्रेजों
ट्रेड यूनियन एक्ट, 1926 को अस्तित्व में आये 100 साल पूरे हो चुके हैं। मजदूरों को संगठित होने का कानूनी अधिकार देने वाला यह कानून जब अस्तित्व में आया था तब भारत अंग्रेजों
देश में फासीवादी हमलों ने लोकतंत्र-संविधान की बहस को तीखा कर दिया है। इस पूरी बहस में अगर कोई गायब है तो वह है मजदूर वर्ग। जैसे मानो लोकतंत्र में मजदूर वर्ग का कहीं कोई स
दिल्ली में 15 सितम्बर से डी टी सी के ठेके के हजारों बस ड्राइवरों ने हड़ताल शुरू की। ये ड्राइवर अपने वेतन में वृद्धि, ई एस आई जैसी मांगों के लिए हड़ताल पर उतरे। ये ड्राइवर द
हरियाणा में बीते लगभग डेढ़ माह से सफाईकर्मियों का जुझारू संघर्ष चल रहा है। इस संघर्ष में कभी चढ़ाव कभी उतार आता रहा है। पर सफाईकर्मियों खासकर महिला सफाईकर्मियों के जोश-उत्स
सूरत के टैक्सटाइल व कढ़ाई मजदूर अगस्त माह में सड़कों पर उतरे थे। वे प्रमुखता से रविवार अवकाष, 8 घंटे का काम व ओवरटाइम के दोगुने भुगतान की मांग कर रहे थे। तब एक ओर प्रशासन न
एक आम मजदूर, एक आम किसान कोई ठेला, रेहडी वाला या छोटा दुकानदार देश में रहने वाला हर आम मेहनतकश जहां जिस देश का बाशिंदा है उसे अपना देश कहता है मगर क्या वह देश उसका अपना ह
मोदी सरकार ने ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना मनरेगा को समाप्त कर उसकी जगह वी बी जी राम जी योजना बड़े गाजे-बाजे के साथ प्रस्तुत की थी। दावा किया गया था कि इसमें अब वर्ष में 10
बुंदेलखण्ड के आदिवासी केन व बेतवा नदी को जोड़ने वाली परियोजना के खिलाफ संघर्षरत हैं। इस परियोजना के तहत बनने वाले दैढ़न बांध में इन आदिवासियों का समूचा रिहाईश क्षेत्र डूब ज
मानेसर (गुड़गांव) मजदूर आंदोलन का दमन करने के लिए पुलिस प्रशासन ने पहले मजदूरों को फर्जी मुकदमों में गिरफ्तार कर जेल भेजा। फिर 12 अप्रैल की रात को हमें (इंकलाबी मजदूर केन्
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।
इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।