मजदूर आवाज

सूरत के नासिर नगर में सैकड़ों परिवारों को बेघर करने की कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल सवाल

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अब तो मुसलमान होना ही काफी है बिना कोई नोटिस बिना कोई सूचना बस बुलडोजर लाओ और घरों को तोड़ दो। गुजरात के सूरत शहर स्थित नासिर नगर क्षेत्र में 30 मई से 2 जून तक बड़े पैमाने

जेन जी आक्रोश पर सवार हो आगे बढ़ती काकरोच जनता पार्टी

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भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा बेरोजगार युवाओं को काकरोच कहे जाने की प्रतिक्रिया में काकरोच जनता पार्टी पैदा हुई थी। अमेरिकावासी अभिजीत दिपके द्वारा सोशल मीडिया पर व्यंग्

मार्च-अप्रैल-मई : मजदूर उभार के 3 माह

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भारत का मजदूर वर्ग उदारीकरण- निजीकरण की नीतियों के भारत में लागू होने के बाद की सबसे तीव्र लहरों में से एक (और संभवतः सबसे व्यापक) से गुजर रहा है। यद्यपि यह लहर अप्रैल मा

हरियाणा में वेतन वृद्धि और पूंजीपतियों की चीख-पुकार

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पिछले दिनों गुड़गांव के आई एम टी मानेसर में हरियाणा सरकार द्वारा लागू न्यूनतम वेतन वृद्धि को लागू करवाने के लिए मजदूरों हड़तालों का तांता लगा रहा। होंडा फैक्टरी से शुरू हुआ

अमेरिकी साम्राज्यवाद के हमले व आतंक के साये में ‘मई दिवस’

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यह एक सच्चाई है कि जितने लोग दूसरे विश्वयुद्ध में मारे गये थे उससे कहीं अधिक लोग दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों के हमले, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष युद्ध में मारे जो चुके हैं। और यह भी सच है कि जब तक साम्राज्यवाद, पूंजीवाद जिन्दा रहेगा तब तक मानव जाति का यूं ही कत्लेआम होता रहेगा। 

दुनिया भर में उठी आवाज : ट्रम्प-नेतन्याहू खूनी हैं!

28 फरवरी को जैसे ही अमेरिकी साम्राज्यवादियों और उनके पिट्ठू इजरायल ने ईरान पर मनमाने तरीके से हमला बोला, वैसे ही दुनिया भर में इस अन्यायपूर्ण युद्ध के खिलाफ जनता के सड़कों

मेघालय : कोयला खदान में विस्फोट, 27 मजदूरों की मौत

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मेघालय में 5 फरवरी को एक कोयला खदान में विस्फोट होने से 27 मजदूरों की मौत हो गयी। अभी भी कई मजदूर 100 मीटर गहरे गड्डे में फंसे हैं। यह खदान पूर्वी जयंतिया हिल्स में थांगस

2025 में अरबपतियों की संपत्ति में भारी वृद्धि हुई

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ब्रिटेन स्थित चैरिटी संस्था आक्सफैम द्वारा सोमवार को प्रकाशित वार्षिक रिपोर्ट में यह दस्तावेजीकरण किया गया है कि तानाशाही और युद्ध का हिंसक विस्तार वैश्विक सामाजिक असमानत

मुख्य न्यायाधीश की सोच

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* देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन दिये जाने की याचिका यह कहकर ठुकरा दी कि इससे हर घर ‘कानूनी युद्धभूमि’ बन सकता है। 

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।