मुक्ति-योद्धाओं के लिए -महमूद दरवेश (फिलिस्तीनी कवि)

जब तक
मेरी एक बालिश्त जमीन भी शेष है
एक जैतून का पेड़ है मेरे पास
एक नीम्बू का पेड़
एक कुआं
और एक कैक्टस का पौधा

जब तक
मेरे पास एक भी स्मृति शेष है
पुस्तकालय है छोटा-सा
दादा की तस्वीर है
और एक दीवार

जब तक
उच्चरित होंगे अरबी शब्द
गाए जाते रहेंगे लोकगीत
पढ़ी जाती रहेंगी ..
कविता की पंक्तियां
अनतार-अल-अब्से की कथाएं
फ़ारस और रोम के विरुद्ध लड़े गए
युद्धों की वीर गाथाएं

जब तक
मेरे अधिकार में हैं मेरी आंखें
मेरे होंठ और मेरे हाथ
मैं खुद हूं जब तक
मैं अपने शत्रु के समक्ष घोषित करूं..

मुक्ति के लिए प्रबल संघर्ष
स्वतन्त्र लोगों के नाम पर हर कहीं
मजदूरों, छात्रों और कवियों के नाम पर

मैं घोषित करूंगा ..
खाने दो कलंकित रोटी
कायरों को
सूरज के दुश्मनों को
मैं जब तक जीवित रहूंगा
मेरे शब्द शेष रहेंगे ..
‘रोटी और हथियार
मुक्ति-योद्धाओं के लिए’
 

अंग्रेज़ी से अनुवाद : अनिल जनविजय
 

आलेख

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अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।

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पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

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जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।