शिक्षा व रोजगार : दशा और दुर्दशा

Published
Tue, 09/01/2026 - 15:50
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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और प्रबंधन के क्षेत्र में सबसे अच्छे शिक्षण संस्थान हैं। निजी क्षेत्र में इनकी टक्कर के संस्थान नहीं हैं। छात्रों में इनमें प्रवेश के लिए होड़ मची रहती है। इसी तरह जे एन यू जैसे सरकारी विश्वविद्यालय भी हैं। 
    
इसके विपरीत प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में सरकारी शिक्षण संस्थानों की हालत ठीक उलटी है। इनकी हालत बेहद खस्ता है। इसकी वजह से गरीब घरों के बच्चे ही इनमें पढ़ने जाते हैं, खासकर प्राथमिक विद्यालयों में। थोड़ी भी बेहतर हालत वाला व्यक्ति अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेजता है। इन्हें हमारे देश में ‘पब्लिक’ स्कूल कहा जाता है। 
    
प्राथमिक और माध्यमिक सरकारी विद्यालयों की खस्ता हालत और उच्च शिक्षण के सरकारी संस्थानों की उच्च गुणवत्ता यूं ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि यह अपने आप हो गया है। यह बाजार की मांग और पूर्ति का मामला भी नहीं है। यह शासक वर्ग की सचेत नीतियों का परिणाम है। 
    
कोई इस सहज नतीजे पर आसानी से पहुंच सकता है कि यदि सरकार के पास शिक्षा पर खर्च करने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं तो उसे प्राथमिकता प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा को देनी चाहिए, न कि उच्च शिक्षा को। यानी उसे सबसे ज्यादा प्राथमिक शिक्षा पर खर्च करना चाहिए, फिर माध्यमिक शिक्षा पर और अंत में उच्च शिक्षा पर। प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा सबके लिए मुफ्त व उच्च गुणवत्ता की होनी चाहिए। ऐसा होने पर वह स्वतः ही सबके लिए समान हो जायेगी। तब उच्च वर्ग के लोग चाहें तो अपने लिए महंगे निजी स्कूलों का इंतजाम कर सकते हैं।
    
प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर उच्च गुणवत्ता की मुफ्त सरकारी शिक्षा पूंजीवाद के भीतर आगे चलकर जीवन में ‘अवसर की समान उपलब्धता’ का कुछ रास्ता खोलती है। कुछ इसलिए कि अन्यथा बच्चों की पारिवारिक पृष्ठभूमि इसकी सीमा बांध देती है। किसी दिहाड़ी मजदूर का बच्चा जब उच्च मध्यम वर्गीय परिवार के बच्चे के साथ एक ही विद्यालय में पढ़ेगा तो शिक्षकों के सारे प्रयास के बावजूद दोनों का विकास एक जैसा नहीं होगा। इसे आज भी तथाकथित ‘ई डब्ल्यू एस’ कोटा के तहत निजी स्कूलों के बच्चों में देखा जा सकता है। तब भी सबके लिए उच्च गुणवत्ता की मुफ्त प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा इसकी कुछ संभावना पैदा करती है कि गरीब घरों के बच्चे भी पूंजीवाद में आगे बढ़ जायें। यूरोप के ‘कल्याणकारी राज्य’ वाले देशों में इसकी झलक मिलती है। 
    
भारत में आजादी के बाद बने शिक्षा के आयोगों ने सबके लिए मुफ्त व समान शिक्षा की सिफारिश की। सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की जो स्थिति रही वह इन सिफारिशों के खिलाफ थी। फीस कम-ज्यादा लगती रही। उसकी गुणवत्ता खराब रही और अमीर लोग निजी विद्यालयों में अपने बच्चों को भेजते रहे। आयोग के बाद आयोग बनते रहे पर हालात सुधरने के बदले बद से बदतर होते गये। उदारीकरण-निजीकरण के दौर में तो सारे बांध जैसे टूट गये। निजी स्कूल हर गली-मुहल्ले में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये। इसके समांतर सरकारी स्कूलों की हालत और खस्ता होती गयी। हालत यह हो गयी कि गरीब लोग भी अपने बच्चों को इन्हीं कुकुरमुत्ता स्कूलों में भेजने लगे। 
    
शिक्षा जगत के विद्वानों और स्वयं सरकार द्वारा गठित आयोगों की सिफारिशों के ठीक विपरीत प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा की यह गति सरकारों की सोची-समझी नीतियों का नतीजा थी। 1991 के पहले कहा जा सकता है कि शिक्षा के मामले में सरकार की प्राथमिकताएं गलत थीं। जैसे सरकार ने देश में पूंजीवादी विकास के लिए ऊपर के कुछ पूंजीपतियों पर निर्भर किया, उसी तरह उसने शिक्षा के क्षेत्र में भी सबके बदले ऊपर के चुनिंदा लोगों पर निर्भर किया। यह स्वतः ही प्राथमिक व माध्यमिक के बदले उच्चे शिक्षा पर जोर की ओर ले जाती है। मध्यम वर्ग के कुछ बच्चे निजी स्कूलों के जरिए अच्छी स्कूली शिक्षा पा लेंगे। फिर यदि उन्हें उच्च गुणवत्ता की सरकारी शिक्षा मिल जाये तो व्यवस्था का काम चल जायेगा। चूंकि उच्च शिक्षा पर खर्च ज्यादा होता है, इसीलिए सरकार ने उसे खुद करने का फैसला किया। 1991 तक आई आई टी, एम्स, इत्यादि की शिक्षा लगभग मुफ्त थी। 
    
1991 के बाद इस मूल गति को जारी रखते हुए सरकार ने पूरे शिक्षा जगत को न केवल निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया बल्कि निजी क्षेत्र को भांति-भांति से प्रोत्साहित किया। प्राथमिक व माध्यमिक स्तर की सरकारी शिक्षा को जान-बूझकर खराब किया गया जिससे निजी स्कूलों को पनपने का मौका मिले। इन स्कूलों में ज्यादातर सरकारी अफसरों व पूंजीवादी नेताओं की पूंजी लगी। इस तरह इसमें उनका अपना वर्गीय हित भी था। उनके अपने बच्चों के लिए अच्छे निजी स्कूल थे ही। 
    
उदारीकरण-वैश्वीकरण के दौर में प्राथमिक व माध्यमिक स्तर की शिक्षा का बेड़ा गर्क होना उसकी आम गति का हिस्सा है जिसके तहत इस पूरे दौर में पूंजीपति वर्ग तथा मध्यम वर्ग का ऊपरी हिस्सा तो फला-फूला है पर आबादी के बाकी हिस्सों की हालत खस्ता हुई है। साथ ही वह उस आम गति का हिस्सा है जिसके तहत हर चीज को मुनाफा कमाने का जरिया बना दिया गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात सभी मामलों में यह किया गया है जबकि ‘कल्याणकारी राज्य’ में ये आम तौर पर सरकार द्वारा मुफ्त उपलब्ध कराये जाते हैं। 
    
भारत जैसे पिछड़े व गरीब देश में भारत के पूंजीपति वर्ग ने शिक्षा-स्वास्थ्य के मामले में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन का यह जो अमरीकी माडल चुना, उसने इन क्षेत्रों में पहले से ही बदहाल स्थिति को और ज्यादा खराब कर दिया। अमेरिका जैसे समृद्ध देश में भी शिक्षा-स्वास्थ्य का निजी क्षेत्र में होना नीचे की आबादी के लिए भारी मुसीबत पैदा करता है। ‘व्यक्तिगत पहलकदमी’ को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की घोषणा करने वाला देश असल में इसे काफी बाधित करता है। इसीलिए वहां समाज में स्तरीकरण ज्यादा है। गरीब परिवारों के बच्चे वहां ऊपर उठने की उम्मीद नहीं कर सकते। 
    
उदारीकरण-निजीकरण के दौर में भारतीय शासकों द्वारा इसी माडल को अपनाने के चलते पहले के मुकाबले ध्रुवीकरण और बढ़ रहा है। गरीब बच्चों के ऊपर उठने की संभावना पहले से कम हो रही है। खस्ताहाल प्राथमिक स्कूल में पढ़़ाई के बाद मध्यमवर्गीय बच्चों के लिए सुलभ महंगी कोचिंग के इस दौर में किसी गरीब घर के बच्चे के एम्स या आई आई टी में प्रवेश पाने की संभावना लगभग शून्य हो गयी है। इसीलिए ऐसा होने पर वह खबर बन जाती है। 
    
यह सही है कि आज पहले के मुकाबले शिक्षा का हर स्तर पर विस्तार हुआ है। लेकिन यह विस्तार गुणवत्ता के साथ नहीं हुआ है। गुणवत्ता अभी भी टापू की तरह है जिसके चारों ओर निम्न स्तर की शिक्षा का समुद्र है, चाहे वह प्राथमिक शिक्षा हो या उच्च शिक्षा का। 
    
देश के पूंजीवादी विकास के साथ-साथ साक्षरता आज पूंजीपति वर्ग की जरूरत बन गयी है। स्वचालित मशीनों के इस दौर में पूंजीपतियों को क,ख,ग अथवा a,b,c जानने वाले मजदूर चाहिए। ज्यादातर बड़ी फैक्टरियां आज दसवीं पास मजदूरों की मांग कर रही हैं। इसीलिए इस तरह के मजदूर उपलब्ध होने चाहिए। लेकिन इस स्तर की कायदे की शिक्षा की वास्तव में जरूरत नहीं होती। हां, तकनीकी शिक्षा के लिए इसकी जरूरत हो सकती है। पर वहां भी काम चल जाता है। 
    
इससे स्पष्ट है कि आज पूंजीपति वर्ग को साक्षर मजदूर तो चाहिए पर पढ़ा-लिखा नहीं। पढ़ा-लिखा मजदूर मुसीबत भी पैदा करता है। यह तथ्य यह भी स्पष्ट कर देता है कि क्यों सरकार का साक्षरता पर जोर है, पर गुणवत्ता पर नहीं। इसे निजी स्कूलों के व्यवसाय से होने वाले मुनाफे से जोड़ दिया जाये तो वह पहेली अबूझ नहीं रह जाती कि क्यों सरकार प्राथमिक व निजी शिक्षा का बेड़ा गर्क कर रही है। 
    
मध्यम वर्ग के ऊपरी हिस्से अपने बच्चों की शिक्षा के लिए महंगे निजी स्कूलों पर निर्भर कर सकते हैं। इन्हें बाद में सरकारी खर्च पर अच्छी इंजीनियरिंग, डाक्टरी या प्रबंधन वगैरह की शिक्षा मिल जाती है। इसके जरिये पूंजीपति वर्ग को उसकी जरूरत लायक अच्छे इंजीनियर, डाक्टर इत्यादि मिल जाते हैं। इस तरह मध्यम वर्ग के ऊपर हिस्से व पूंजीपति वर्ग दोनों का काम चल जाता है। बाकी लोग जायें भाड़ में। वैसे प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा का बेड़ा गर्क होने से ऊपर मध्यम वर्ग को थोड़ा सहूलियत भी है। उसके बच्चों को प्रतियोगिता कम झेलनी पड़ती है क्योंकि नब्बे प्रतिशत आबादी के बच्चे प्रतियोगिता में शामिल ही नहीं हो पाते। वे पांचवीं, आठवीं या दसवीं तक अटक जाते हैं। जो बारहवीं पास भी कर लेते हैं वे लाखों की ‘कोचिंग’ का लाभ नहीं उठा सकते क्योंकि उनके मां-बाप के पास उतने पैसे नहीं होते। 
    
उदारीकरण-निजीकरण के इस दौर में उच्च शिक्षा का भी बेड़ा गर्क हुआ है। इसका विस्तार हुआ है पर गुणवत्ता गिरी है। इसका मुख्य कारण डिग्रियां बांटने वाले निजी संस्थानों की भरमार है। हालत यह है कि जेब में पैसा होने पर कोई भी डिग्री पाई जा सकती है- इंजीनियर, डाक्टर, प्रबंधक, वकील, एकाउन्टेन्ट इत्यादि सब। परम्परागत रोजगार के अवसरों के खात्मे तथा उच्च शिक्षा की आकांक्षा दोनों ने मिलकर डिग्रियों के बाजार को आसमान पर पहुंचा दिया है। मां-बाप खेत बेचकर या मकान गिरवी रखकर अथवा कर्ज लेकर अपने बच्चों के लिए डिग्रियां खरीद रहे हैं। पर डिग्रियां पाने के बाद बच्चों और मां-बाप दोनों को पता चलता है कि वे किसी काम की नहीं हैं। तब नयी डिग्रियों की तलाश शुरू हो जाती है। हालात यह हैं कि आज कई छात्र-छात्राओं के पास चार-चार, पांच-पांच डिग्रियां या डिप्लोमा हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि अक्सर नयी डिग्रियां घटते स्तर की होती हैं। स्थिति की भयावहता का पता तब चलता है जब सरकारी विभाग में चपरासी की नौकरी के लिए भी स्नातक या परास्नातक आवेदन कर डालते हैं, वह भी दस-बीस गुना ज्यादा। 
    
आज छात्र-छात्राएं डिग्रियां खरीदते जा रहे हैं और इन्हें बेचने वाले शिक्षा के सौदागर मालामाल होते जा रहे हैं। आज सड़कों के किनारे शिक्षा की इन दुकानों की कतारें खड़ी हैं जहां आम छात्र-छात्राएं उच्च शिक्षा के नाम पर डिग्रियां खरीद रहे हैं। इन डिग्रियों को हासिल करने वालों में से दस प्रतिशत भी अपनी डिग्री के अनुरूप नियमित काम नहीं पा रहे हैं। ज्यादातर को आकस्मिक काम से संतोष करना पड़ रहा है। चालीस प्रतिशत को तो अपनी डिग्री के अनुरूप कोई भी काम नहीं मिल रहा है। 
    
भारत में शिक्षा और रोजगार के बीच संबंध पहले भी काफी दिक्कततलब था। 1950 व 60 के दशक में भी पढ़े-लिखे डिग्रीधारी बेरोजगार युवकों पर बंबईया फिल्में देखने को मिलती थीं। पर अब यह समस्या अत्यन्त विकराल हो गयी है। परंपरागत रोजगार (खेती व दस्तकारी) के खात्मे तथा आधुनिक उद्यमों में नयी स्वचालित तकनीक ने रोजगार की समस्या को वैसे भी भयंकर बना दिया है। रही-सही कसर डिग्रियों के व्यवसाय ने पूरी कर दी है। इसके कारण मां-बाप आर्थिक तौर पर दिवालिया हो रहे हैं तथा युवक-युवतियां मानसिक अवसाद का शिकार। फलस्वरूप नशाखोरी व अपराध दोनों बढ़ रहे हैं। 
    
साक्षर व डिग्रीधारी अनपढ़ों की यह युवा फौज आज पूंजीवादी व्यवस्था और शासकों की छाती पर वह बोझ है जिससे वे किसी भी तरह छुटकारा नहीं पा सकते। हिन्दू-मुसलमान और कांवड यात्राएं भी एक सीमा के बाद कारगर नहीं रह जातीं। 
    
देश के पूंजीपति वर्ग और उसके राजनीतिक नुमाइंदों यानी पूंजीवादी नेताओं को देश में शिक्षा व रोजगार की इस शोचनीय हालत का पता है। पूंजीपति वर्ग ने शिक्षा के निजीकरण की वकालत की है और पूंजीवादी नेताओं ने सत्ता में रहते इसे अंजाम दिया है। संघी या हिन्दू फासीवादी तो और आगे गये हैं। उन्होंने शिक्षा में गाय-गोबर और भूत-प्रेत से करेले को नीम चढ़ा दिया है। 
    
आज राहुल गांधी बता रहे हैं कि 2014 के पहले देश में शिक्षा की हालत अच्छी थी। उनकी यह बात दिखाती है कि यदि कांग्रेसी सत्ता में आ गये तो शिक्षा व रोजगार की हालत में कितना सुधार होगा। बेड़ा गर्क करने वालों से ही बेहतरी की उम्मीद नहीं की जा सकती। 
    
और न उनसे उम्मीद की जानी चाहिए जो शिक्षा को नीचे से ठीक करना चाहते हैं। सरकारी स्कूलों की दुर्दशा के वीडियो से सरकार उनको ठीक करने नहीं चल पड़ेगी। वह उन पर पर्दा डालने के नये तरीके ईजाद कर लेगी। संघी तो वैसे भी इस काम में माहिर हैं। हां, भंडाफोड़ के रूप में यह मुहिम अच्छी है। इससे लोगों में उद्वेलन पैदा होता है। 
    
प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकार की नीतियों से तय होती है। इसीलिए उनमें कोई भी परिवर्तन सरकार की नीतियों में परिवर्तन की मांग करती हैं। इसीलिए इस संबंध में सामान्य नारा यह होना चाहिए कि शिक्षा व स्वास्थ्य दोनों सरकार द्वारा लोगों को मुफ्त प्रदान कराये जाने चाहिए, वह भी ऊंची गुणवत्ता के। जहां तक रोजगार का सवाल है, काम के घंटे कम करके तथा नये श्रम सघन उद्यमों का विकास करके सबको रोजगार दिया जा सकता है। इसकी जिम्मेदारी भी सरकार की होनी चाहिए। केवल इन्हीं मांगों के लिए आंदोलन के जरिये ही शिक्षा-रोजगार की बेहद खराब स्थिति में किसी बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है।  

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