पश्चिम एशिया के संकट का वैश्विक प्रभाव

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Thu, 07/16/2026 - 08:56
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उम्मीद के मुताबिक इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन की अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा धज्जियां उड़ा दी गयी हैं। ट्रम्प ने तुर्की में हुए नाटो शिखर सम्मेलन में बोलते हुए यह घोषणा की कि उनके लिए समझौता ज्ञापन समाप्त हो गया है। इसके बाद उन्होंने ईरानी नेतृत्व को भद्दी-भद्दी गालियां दीं। ट्रम्प को अपनी हत्या का भय सताने लगा। भयाक्रांत ट्रम्प ने घोषणा कर दी कि यदि ईरानी नेतृत्व उनकी हत्या करा देता है तो उन्होंने अमरीकी सेना को आदेश दे रखा है कि ईरान को दुनिया के नक्शे से मिटा दे। इस मामले में इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद द्वारा फैलाई गयी यह अफवाह कि ईरान ट्रम्प की हत्या की साजिश कर रहा है, ट्रम्प को भड़काने में कामयाब रही। 
    
समझौता ज्ञापन की शर्तों के मुताबिक न तो लेबनान में इजरायली हमले कम हुए और न ही इजरायली सेनायें दक्षिण लेबनान से पीछे हटीं। अमरीकी शासक इजरायल द्वारा लेबनान पर हमला रोकने में कोई भूमिका नहीं निभा सके। इसी प्रकार, होरमुज जलडमरूमध्य के रास्ते का प्रबंधन ईरान करेगा और इसे 60 दिनों तक जहाजों के पारगमन के लिए खोल दिया जायेगा, इसका पालन ईरान ने किया और कुछ दिनों तक ईरान प्रबंधन और देखरेख में जहाजों की आवाजाही शुरू हुई। लेकिन अमरीकी साम्राज्यवादी होरमुज पर ईरानी नियंत्रण के विरुद्ध जबरदस्ती जहाजों की आवाजाही शुरू कराने की कोशिश करने लगे। ईरानी फौज ने ऐसे जहाजों को रोका और इसके जवाब में अमरीकी सेनाओं ने ईरान पर फिर से हमलों की शुरूवात कर दी। उन्होंने न सिर्फ दक्षिणी इराक के इलाकों में बल्कि ईरान के भीतरी इलाकों में बड़े पैमाने पर बमबारी की। इसके जवाब में ईरान ने बहरीन, कुवैत और जार्डन में मौजूद अमरीकी फौजी अड्डों को अपने मिसाइल और ड्रोन हमलों का निशाना बनाया। खाड़ी के देशों में मौजूद अमरीकी फौजी अड्डे इसका निशाना बने। होरमुज के पारगमन के रास्ते को ईरान ने फिर से पूरी तरह से बंद कर दिया। दुनिया भर में फिर से तेल की व गैस की आवाजाही में रुकावट आ गयी। दुनिया भर में पेट्रो रसायन उत्पादों और खाद की पहुंच का संकट खड़ा हो गया और व्यापार में बाधा आ खड़ी हो गयी। 
    
खुद खाड़ी के देशों के भीतर अमरीकी फौजी अड्डों की मौजूदगी उनके लिए खतरे का सबब बनने लगी। अभी तक खाड़ी के देशों के भीतर अमरीकी फौजी अड्डे उनकी सुरक्षा के कवच समझे जा रहे थे, अब वे ही खाड़ी के देशों के लिए असुरक्षा का कारण बनने लगे। ईरान ने खाड़ी के देशों की सुरक्षा का मसला खुद खाड़ी के देशों की सामूहिक जिम्मेदारी होने की वकालत की और बाहरी ताकतों के हस्तक्षेप को खतम करने की मांग की। अब अमरीकी साम्राज्यवादी खुद खाड़ी के देशों से अपने फौजी अड्डों को अन्यत्र ले जाने की बातें सोचने लगे हैं। 
    
इसी दौरान, समझौता ज्ञापन के अनुसार, ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाने की प्रक्रिया जो शुरू हुई थी, उसे अमरीकी साम्राज्यवादियों ने समाप्त कर दिया और ईरान की रोकी गयी अरबों डालर की परिसम्पत्तियों को वापस करने की बात को रोक दिया। 
    
यह सब ऐसे समय में किया जा रहा था जब ईरान अपने शहीद नेता अली खामनेई को सुपुर्दे खाक करने की प्रक्रिया को लागू कर रहा था। इसी दौरान लोगों को इसमें शामिल होने से रोकने के लिए रेल लाइन के एक पुल को अमरीकी साम्राज्यवादियों ने उड़ा दिया। इसके बावजूद ईरान और इराक में लाखों लोग उनके जनाजे में शामिल हुए। दुनिया भर से लोग उनके जनाजे में शामिल होने के लिए ईरान पहुंचे। इस जनाजे की यात्रा में लाखों-करोड़ों लोगों की हिस्सेदारी ट्रम्प और इजरायली शासकों के लिए एक सदमे जैसी थी। एक तरफ ईरान के भीतर ईरानी अवाम की ईरानी सत्ता के साथ एकजुटता दिखाई दे रही थी और ‘‘अमरीकी साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’’ व ‘‘इजरायली यहूदी नस्लवादी जनसंहार करने वाली हुकूमत मुर्दाबाद’’ के नारे ईरान भर में गूंज रहे थे। वहीं अमरीका और इजरायल के भीतर व्यापक अवाम वहां के सत्ताधारियों के विरोध में खड़ी हो रही थी। सिर्फ इतना ही नहीं, खुद शासकों के भीतर ईरान युद्ध पर अमरीकी और इजरायली नीतियों को लेकर तीखे मतभेद उभरने लगे थे। 
    
अब यह युद्ध रुक-रुक कर फिर से अमरीकी साम्राज्यवादियों ने शुरू कर दिया है। यह अब सिर्फ अमरीका, इजरायल और ईरान के बीच सीमित नहीं रह गया है। और न यह सिर्फ खाड़ी के देशों तक सीमित रह गया है। इसका प्रभाव समूची दुनिया पर पड़ रहा है। यह प्रभाव नाटो शिखर सम्मेलन में भी दिखाई पड़ा है। अभी तक यूरोप के नाटो देश अमरीकी साम्राज्यवादियों के हितों से संचालित उसके सहयोगी थे। लेकिन इस बार ट्रम्प ने पूरी कोशिश करके नाटो देशों को ईरान युद्ध में शामिल कराना चाहा। लेकिन ट्रम्प इसमें सफल नहीं हुए। कुछ नाटो देशों ने स्पष्ट तौर पर अपने हवाई क्षेत्रों का ईरान पर हमला करने के लिए इस्तेमाल करने से रोक दिया। कई देशों ने यह कहा कि यह उनका युद्ध नहीं है। अमरीकी साम्राज्यवादी और नाटो के यूरोपीय देशों के बीच मतभेद काफी उभरकर सामने आ गये। यूरोपीय देश ऊर्जा संकट के शिकार होने लगे थे। वे किसी भी तरह से होरमुज का रास्ता पारगमन के लिए खोलना चाहते थे। वे इसे ताकत के बल पर खोलने में असमर्थ थे और वे यह भी समझते थे कि अमरीकी साम्राज्यवादी भी इसे ताकत के बल पर नहीं खोल सकते। इसलिए वे सभी ईरान के साथ अलग-अलग समझौता करना चाहते थे। लेकिन वे रूस के विरुद्ध यूक्रेन के युद्ध को जारी रखने के पक्ष में थे, जबकि शुरूवाती दौर में ट्रम्प रूस के साथ मिलकर यूक्रेन पर कोई समझौता कराना चाहते थे। इसमें वे यूरोपीय नाटो देशों की कोई भूमिका नहीं चाहते थे। इस बार के नाटो शिखर सम्मेलन में अमरीकी साम्राज्यवादियों ने यूरोपीय नाटो देशों के साथ तालमेल को फिर से बढ़ाने की कोशिश की। 
    
अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ईरान के साथ रूस, चीन और उत्तरी कोरिया के बढ़ते गठबंधन को अमरीका और नाटो के लिए मुख्य खतरा बताया और इनकी संयुक्त ताकत से निपटने के लिए नाटो को और मजबूत करने पर जोर दिया। यूरोपीय नाटो सदस्यों ने रूस के विरुद्ध यूक्रेन को हथियारों और वित्तीय मदद करने का ठोस प्रस्ताव पारित किया। यूरोपीय नाटो देश इस बात के लिए तैयार हो गये कि वे अपने सकल घरेलू उत्पाद का 5 प्रतिशत रक्षा व्यय में रखेंगे। यूरोपीय देशों के भीतर हथियार उद्योग बढ़ाने पर जोर दिया गया। अमरीकी साम्राज्यवादी अपने अरबों डालर के हथियार यूरोपीय देशों को बेचने और खुद यूरोपीय देशों के भीतर हथियार उत्पादन बढ़ाने में मदद करने के लिए तैयार हो गये।
    
अमरीकी साम्राज्यवादियों की निगाह में तुर्की की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। एक तरफ, तुर्की नाटो का सदस्य देश है। वह यूरोप में बड़ी ताकतवर सेना रखता है। वह हथियारों का निर्यातक देश है। दूसरी तरफ वह पश्चिम एशिया से सटा हुआ देश है। वह इस क्षेत्र में अपना प्रभाव मजबूत करना चाहता है। वह इस क्षेत्र के देशों- मिस्र, साऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान के साथ मिलकर एक सुरक्षा ढांचा बनाना चाहता है। इससे वह नाटो की तरह का पश्चिम एशिया का गठबंधन बनाने में भूमिका निभाना चाहता है। वह इजरायल के विरुद्ध समय-समय पर तीखी बयानबाजी भी करता रहा है। ट्रम्प इस कोशिश में लगा हुआ है कि तुर्की और इजरायल के बीच सम्बन्ध सामान्य हो जायें। इजरायली शासक भी ईरान के बाद तुर्की पर हमला करने की बातें करते रहे हैं। सीरिया को लेकर भी तुर्की और इजरायल के बीच हितों का टकराव है। तुर्की के एक बड़ी सैन्य ताकत होने के नाते अमरीकी साम्राज्यवादी उसे अपने खेमे में मजबूती से रखना चाहते हैं। लेकिन तुर्की के शासक भी अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ रिश्तों को मजबूत करते हुए रूस, चीन और ईरान के साथ भी अपने रिश्तों को मजबूत कर रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी इस स्थिति को समझकर तुर्की के प्रति अपने रुख में परिवर्तन कर रहे हैं। वे इजरायल को ऊपरी तौर पर खरी-खोटी सुना देते हैं और कहते हैं कि यदि ट्रम्प नहीं होते तो तुर्की इजरायल पर हमला कर देता। 
    
इस तरह, यह देखा जा सकता है कि ईरान पर अमरीकी-इजरायली थोपे गये युद्ध ने दुनियाभर में समीकरणों में बदलाव लाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा ईरान को अलग-थलग करने की पिछले 4 दशकों से की गयी कोशिशें अब बेकार हो गयी हैं। ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध और नाकेबंदी ने इसकी प्रतिरोध की क्षमता को कमजोर करने के बजाय उसे और ज्यादा मजबूत किया है। ईरानी हुकूमत ने लेबनान, फिलिस्तीन, यमन, इराक और सीरिया में प्रतिरोध संगठनों को मजबूत किया है और उसके इन प्रयासों ने फिलिस्तीन की आजादी के प्रश्न को दुनिया के सामने जोरदार तरीके से पेश करने में अहम भूमिका निभायी है। अमरीका-इजरायल द्वारा जबरन थोपे गये युद्ध ने ईरान की जवाबी हमले की उसकी ताकत को दुनिया के सामने आश्चर्यजनक सच्चाई के बतौर पेश किया है। 
    
इसने अमरीकी साम्राज्यवाद की न सिर्फ पश्चिम एशिया में बल्कि समूची दुनिया के पैमाने पर प्रभुत्वकारी स्थिति को कमजोर किया है। हालांकि यह अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और फौजी ताकत है। इतना सब होने के बावजूद इसका प्रभाव कमजोर हुआ है। और दुनिया में इसके प्रतिद्वंद्वी के बतौर रूस और चीन सामने आ गये हैं। इसके एकछत्र प्रभुत्व का काल समाप्त होने की ओर है। ईरान के जवाबी प्रहार ने इसकी ताकत की सीमाओं को उजागर कर दिया है। ऐसी स्थिति में अमेरिकी साम्राज्यवादी नये सिरे से गठबंधनों को शक्ल देने के लिए मजबूर हो गये हैं। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 
    
इस पूरी प्रक्रिया को तेज करने में ईरान द्वारा किये पलटवार की एक भूमिका है। इसने पश्चिम एशिया से बाहर यूरोप, दक्षिण एशिया और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपना प्रभाव छोड़ा है। साम्राज्यवादियों की बढ़ती टकराहट वस्तुगत तौर पर दुनिया भर की मजदूर-मेहनतकश आबादी और उसके नेतृत्व के लिए एक ओर नये-नये युद्धों तो दूसरी ओर नयी संभावनाओं के द्वार भी खोलती है। 

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