एन आर सी, हिंदू फासीवाद और मणिपुर

Published
Thu, 07/16/2026 - 08:55
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असम के बाद एन आर सी का मुद्दा मणिपुर में गहराता जा रहा है। असम में 1300 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद 19 लाख नागरिक और उनके बच्चे अपने ही देश में शरणार्थी या अवैध प्रवासी बना दिए गए। अब इस स्थिति में मणिपुर को भी धकेलने की मजबूत संभावना बनती जा रही है।
    
हिंदू फासीवादियों के लिए नागरिकता का मुद्दा सबसे प्रिय मुद्दा है। यह हिंदू बहुसंख्यकवाद को आगे बढ़ाकर फासीवादी ध्रुवीकरण को आगे बढ़ाने के रूप में इनका महत्वपूर्ण हथियार है। इसीलिए इनके लिए यह आम लोगों के समावेशन (शामिल करने) का जरिया नहीं है बल्कि बहिष्करण (बाहर करने) का जरिया है। विशेष गहन पुनरीक्षण जैसे असंवैधानिक मुद्दे को लागू करके और इसके जरिए नागरिकता परीक्षण से देशव्यापी पैमाने पर ये बहिष्करण की ओर बढ़ ही चुके हैं। मगर इससे पहले भी सूक्ष्म रूप से, अलग-अलग राज्यों में इन्होंने तरह-तरह से घुसपैठिए आदि का तर्क देकर, एन आर सी के लिए माहौल पैदा किया। यही इन्होंने मणिपुर में भी किया। 
    
मणिपुर, 2023 से एक भीषण जातीय संघर्ष की चपेट में है। इसे, इस अंधेरी सुरंग में धकेलने वाले मुख्यतः हिंदू फासीवादी ही हैं। खबरों के मुताबिक मई 2023 से मार्च 2026 तक हिंसा में 217 लोग मारे जा चुके हैं और 58,821 लोग विस्थापित हुए हैं। इसके अलावा राहत शिविरों में 731 विस्थापितों की मौत हो चुकी है, और 43,000 से अधिक लोग अब भी राहत शिविरों में जीवन बिता रहे हैं। 
    
मणिपुर की जनता मुख्यतः तीन जनजातियों मैतेई, कुकी-जो और नागा से मिलकर बनी हुई है। जो ऐतिहासिक रूप में भाषाई, सांस्कृतिक दृष्टि से एक ही मूल के माने जाते हैं। हिंदू फासीवादियों द्वारा, इन जनजातियों के भीतर मौजूद विभेदों और विवादों को हवा देकर, इसे एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल करते हुए संकट को अत्यधिक जटिल और पेचीदा बनाया जा रहा है। यह एन आर सी के मामले में और ज्यादा साफ दिखता है।
    
इस साल जून माह में, मणिपुर के 14 नागरिक समाज संगठनों (CSOs) ने ना.स.सं कांगलीपाक के बैनर तले एन आर सी के अद्यतन (अपडेट) करने की मांग बड़े स्तर पर की। हजारों लोगों ने ‘‘एन आर सी अपडेट नहीं, तो जनगणना नहीं’’, ‘‘सिर्फ एन आर सी अपडेट ही मणिपुर को बचा सकता है’’, और ‘‘जब तक एन आर सी 1951 अपडेट नहीं होता, जनगणना न कराएं’’ जैसे नारों के साथ इम्फाल में एक विशाल रैली निकाली। 
    
एन आर सी की इस मांग के पीछे मुख्यतः घाटी में रहने वाले मैतेई समुदाय के लोग हैं मगर इसमें सभी मैतेई समुदाय के लोग शामिल नहीं हैं। इसका बहुसंख्यक हिस्सा जो हिंदूकरण होने के चलते हिंदू धर्म में शामिल हो गए, वही इस मांग के पीछे हैं। ये संगठन इन्हीं के बीच से हैं और जिनका संबंध हिंदू फासीवादी संगठन और पार्टी से है। इसने, पिछले 10-12 सालों में अपनी फासीवादी राजनीति के दम पर और आराम्बाई तेंगोल जैसा हथियार रखने वाले संगठन इनके बीच खड़े करके, मामले को इस मोड़ पर पहुंचा दिया है। 
    
हिंदू मैतेई की यह मांग न केवल कुकी-जो जनजाति के खिलाफ है बल्कि यह मैतेई पांगल जो कि मुस्लिम हैं घाटी में ही रहते हैं इनके भी सीधे विरोध में है और इन्हें भी निशाने पर लेती है। 
    
ना. स. सं कांगलीपाक का तर्क है कि 1951 को एन आर सी का आधार वर्ष बनाया जाय। एन आर सी में विफल रहने वालों को ‘‘मणिपुर के गैर-नागरिक’’ घोषित किया जाना चाहिए। जबकि यह भी तथ्य है कि 1951 की जनगणना ने पूरे मणिपुर राज्य को कवर (आधे जनजाति लोग) नहीं किया था। यह मांग स्पष्टतः संविधान के नागरिकता कानून के विरोध में है जो 1987 से पहले भारत में जन्मे हर व्यक्ति को भारत का नागरिक घोषित करती है।
    
दरअसल मणिपुर का भारत में 1949 में विलय हुआ। मणिपुर की जनजाति आबादी इसके खिलाफ थी। इसके खिलाफ तत्काल ही भारत से आजाद मणिपुर के लिए इन जनजातियों ने संघर्ष शुरू कर दिया था। इसी से मणिपुर में बाद के दशकों में शासकों के हस्तक्षेप और खेल से इनके बीच विभाजन और टकराव की स्थिति बनी। इस बीच ही 1951 में जनगणना के जरिए एन आर सी हुई। जाहिर है इसमें लोग छूट गए। इसके अलावा कुकी-जो लोग जो पूर्वोत्तर भारत की अलग-अलग जगहों में बिखरे हुए थे, इनमें एकजुट होने की प्रक्रिया भी शुरू हुई। मणिपुर में इनका आगमन भी हुआ। 
    
कुकी जनजातियां मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में रहती हैं। इनका एन आर सी से विरोध है। ये विशेष शर्तों पर ही एन आर सी के पक्ष में हैं।  
    
कुकी-जो जनजाति समुदाय में कई उपजनजातियों में से एक थाड़ो जनजाति ने खुद को कुकी से अलग जनजाति घोषित कर दिया। इसे स्वतंत्र जनजाति समुदाय के रूप में काफी पहले नेहरू सरकार ने मान्यता दे दी थी। इसके नेतृत्व थाडो इनपी मणिपुर (TIM) का कहना है कि थाडो एक अलग जातीय समूह है थाडो कुकी नहीं है, या कुकी के अधीन नहीं है, स्वतंत्र इकाई है। यह एन आर सी का समर्थन कर रहा है। नेतृत्व का यह हिस्सा भाजपाइयों से जुड़ा हुआ है जबकि दूसरे हिस्से थाडो इनपी जनरल हेडक्वार्टर (TI&GHQ) ने पहले हिस्से का विरोध किया है। इस दूसरे हिस्से ने पहले को खारिज कर दिया और इसकी एन आर सी के समर्थन को भी खारिज कर दिया। हिंदू फासीवादी यहां भी फूट डालने और एक को अपने पक्ष में करने में सफल हुए हैं।
    
नागा जनजाति, कुकी-जो से अपने अंतरविरोध के चलते एन आर सी मामले में मैतेई संगठनों के साथ खड़ी है। कुकी जनजाति उन जिलों में भी है जिन्हें नागा जाति बहुल इलाके माना जाता है। नागा जनजाति बृहत्तर नागालैंड की समर्थक है। जबकि कुकी संगठन अपने लिए अलग राज्य या केंद्र शासित इलाके बनाने के लिए संघर्षरत हैं। नागा जनजाति भी कुकी की ही तरह ईसाई धर्म मानती है। कुकी के अलग प्रशासन की मांग इन्हें बृहत्तर नागालैंड के विरोध में लगती है साथ ही इससे वे अपने इलाके में इनके हस्तक्षेप को बढ़ने के रूप में देखते हैं। वे इन इलाकों को अपनी पैतृक भूमि के रूप में देखते हैं।
    
इसी तरह मैतेई संगठन बृहत्तर नगालैंड की मांग को अपने हितों के खिलाफ देखते हैं। जबकि मैतेई संगठन की अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग के विरोध में नागा जनजाति है। 
    
पांगल (मैतेई मुस्लिम) समुदाय की स्थिति बेहद नाजुक और विरोधाभासी है। एक ओर जहां ये, एन आर सी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) का समर्थन करते हैं, वहीं दूसरी ओर ये, कुकी समुदाय के साथ शांति और सह-अस्तित्व की पुरजोर वकालत करते हैं, और संघर्ष में तटस्थता बनाए रखने की कोशिश करते हुए खुद को दोनों पक्षों की आग में घिरा हुआ पाते हैं। एन आर सी की मांग मुख्यतः मैतेई-बहुल घाटी के 14 नागरिक समाज संगठनों द्वारा उठाई गई है। इन संगठनों ने अपने ज्ञापन में मैतेई पांगलों को भी ‘‘अवैध प्रवासियों’’ के रूप में चिह्नित किया है।
    
मणिपुर की इस जटिलता की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है जिसके जिम्मेदार ब्रिटिश साम्राज्यवादी हैं जिन्होंने विभाजनकारी राजनीति के जरिए भी उपनिवेशवाद की जंजीरों में मणिपुर को बांध लिया था। और अब हिंदू फासीवादियों के दौर में यह अपने चरम पर है।
    
एन आर सी के मुद्दे पर असम के बाद सबसे घनीभूत रूप में मणिपुर के हिंदू मैतेई समुदाय की मांग उग्र रूप में सामने आ चुकी है। इसके साथ अन्य जनजाति समुदाय भी एक दूसरे से अपने अंतरविरोध के चलते इसके पक्ष में आने को मजबूर हैं। 
    
इस भीषण संकट का राजनीतिक अर्थशास्त्र भी है। दरअसल हिंदू फासीवाद और एकाधिकारी पूंजी का गठजोड़ वर्तमान संकट के मूल में है। मणिपुर की पहाड़ियां, जो मुख्यतः कुकी-जो और नागा समुदायों का निवास स्थान हैं, प्राकृतिक संसाधनों के विशाल भंडार से समृद्ध हैं। इनमें क्रोमाइट, चूना पत्थर, निकिल, तांबा, मैलाकाइट, एज्यूराइट, मैग्नेटाइट और प्लैटिनम समूह के तत्व (PGE) शामिल हैं। भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने अकेले चूना पत्थर का लगभग 20 मिलियन मीट्रिक टन भंडार होने का अनुमान लगाया है।
    
इसी तरह यहां प्लेटिनम का भंडार भी खोजा गया है, जो सोने से भी अधिक कीमती है। आरोप है कि यह विशाल भंडार कुकी आदिवासी समुदायों के क्षेत्रों में पाया गया है। राज्य सरकार ने 2017-18 के बीच इन्हीं खनिजों की खोज के लिए निजी कंपनियों के साथ 39 समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए, जिनमें कथित तौर पर स्थानीय समुदायों की सहमति या पर्यावरणीय मंजूरी नहीं ली गई। स्थानीय जनजातियों ने इसका लगातार विरोध किया है। अब एन आर सी इन संसाधनों पर नियंत्रण का जरिया बन सकता है - ‘अवैध प्रवासियों’ को हटाकर खनिज, तेल, गैस और जल विद्युत संसाधनों तक आसान पहुंच प्राप्त की जा सकती है।
    
कुल मिलाकर पहले से भयावह हिंसा, एक-दूसरे से नफरत भरे उन्माद और विभाजन के बीच मणिपुर को एन आर सी ने और गहरे से विभाजित कर दिया है। इस माहौल और हिंदू फासीवादी राजनीति के खिलाफ मणिपुर में फिलहाल कोई मजबूत आवाज उठती नहीं दिखती। मगर देर सबेर यह आवाज ताकतवर बन कर अवश्य ही सामने आएगी। 

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