यहां नक्सल वहां नक्सल

Published
Thu, 10/01/2026 - 15:50
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जब से देश के गृहमंत्री ने भारत के मध्य पूर्व में नक्सलवाद या माओवाद के सफाये की घोषणा की है तब से नक्सल शब्द हर उस जगह पहुंच गया जहां वह पहले नहीं था। ‘नक्सल’ लाल किले, भारत की संसद के बाद अब भारत के उच्चतम न्यायालय तक में पहुंच गया है। 
    
मोदी जी ने अपने पन्द्रह अगस्त के भाषण में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का प्रयोग किया और फिर चेतावनी जारी की। मोदी के आरोप के जवाब में भारत के कई नेताओं ने अपने को दिमागी नक्सल घोषित कर दिया। चिदम्बरम्, केजरीवाल इन नेताओं में प्रमुख थे। 
    
संसद में भी ‘नक्सल-नक्सल’ का प्रयोग आम है। अब उच्चतम न्यायालय में वंदेमातरम् पर चल रही बहस में देश के सालिसिटर जरनल तुषार मेहता ने अपने विरोधी वरिष्ठ अधिवक्ता एस मुरलीधर को कह दिया, ‘‘कानून संविधान के अनुसार ही बनाए जाते हैं। कानून नक्सलियों की सोच के आधार पर नहीं बनाए जा सकते।’’ मुरलीधर ने तुषार मेहता का विरोध किया। तुषार मेहता के तर्क के आधार पर जिन राष्ट्रीय नेताओं ने वंदेमातरम् गीत के पहले दो पैराग्राफ ही गाने की व्यवस्था की थी वह सभी नक्सली हो गये। यानी रवीन्द्रनाथ टैगोर, सरदार पटेल, सुभाष चन्द्र बोस आदि सभी नक्सली हो गये। 
    
यह मजे की बात है या इतिहास का कोई अघोषित नियम है। मजे की बात यह है कि आज के दौर में नक्सल शब्द को घर-घर पहुंचाने का काम स्वयं मोदी एण्ड कम्पनी कर रही है। हर जिज्ञासु बड़े से लेकर बच्चे तक नक्सल शब्द का अर्थ ढूंढ रहे हैं और नक्सलवाद से परिचित हो रहे हैं। नक्सलवाद का इतना प्रचार तो स्वयं नक्सली भी नहीं कर सके हैं।
    
जहां तक इतिहास के अघोषित नियम की बात है। वह नियम यह है कि इतिहास में शासक (शोषक-उत्पीड़़क) क्रमशः ऐसे हालात पैदा करते जाते हैं कि वे अपने अंत करने वालों को तैयार करते जाते हैं। ठीक इसी कड़ी में वे शोषित-उत्पीड़ितों को उन विचारों से अनजाने ही परिचित करा देते हैं जो उनके खिलाफ एक हथियार बन जाते हैं। कभी अंग्रेजों ने भगतसिंह के साथ भी ऐसा ही किया था। भगतसिंह के नारों ‘इंकलाब जिन्दाबाद!’ ‘साम्राज्यवाद का नाश हो!’ को भारत के घर-घर में पहुंचा दिया था। 

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